क्या भारत में धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव होता है? उत्तर हम सब जानते हैं। लेकिन अगर प्यू रिपोर्ट पर यक़ीन करें तो अधिकतर भारतीयों ने अपने जीवन में किसी प्रकार के जातिगत और धर्म-आधारित भेदभाव का सामना नहीं किया है। संयोग ही है कि जब यह रिपोर्ट बाहर आई, आईआईटी मद्रास के एक अध्यापक ने यह आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया कि उनके साथ लगातार जातिगत भेदभाव किया जा रहा है। विपिन पुथियादेतवीतिल ने कहा कि भेदभाव करनेवालों में ताक़त की जगहों पर बैठे लोग शामिल हैं और वे हर प्रकार के राजनीतिक विचार के हैं और भेदभाव करनेवालों में पुरुष, स्त्री, दोनों ही शामिल हैं। आप प्रगतिशील रानजीतिक विचार के हो सकते हैं और जातिवादी भी। महिला भी जातिवादी हो सकती है। उसी प्रकार आप मुसलमान हों या ईसाई, जातिवाद का कीड़ा आपके भीतर हो सकता है। आप अत्यंत सुशिक्षित समाज के सदस्य हो सकते हैं और उतने ही शातिर जातिवादी भी।
क्या भारत में धर्म, जाति के आधार पर भेदभाव नहीं होता है?
- वक़्त-बेवक़्त
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- 5 Jul, 2021

भेदभाव इतना स्वाभाविक होता है कि सामान्य व्यवहार का हिस्सा बन जाता है और हम उसे भेदभाव की तरह पहचान भी नहीं पाते। अगर भारत की महिलाओं के बीच सर्वेक्षण करके यही सवाल पूछा जाए तो शायद उनमें भी अधिकतर यही कहेंगी कि उनके साथ भेदभाव नहीं होता।