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उत्तर प्रदेश में मुस्लिम सबसे सुरक्षित हैं। अगर हिंदू सुरक्षित हैं, तो वे भी सुरक्षित हैं।
-योगी आदित्यनाथ, सीएम यूपी सोर्सः एएनआई पोडकास्ट
योगी ने कहा- अगर 2017 से पहले यूपी में दंगे होते थे, अगर हिंदुओं की दुकानें जलती थीं, तो मुस्लिमों की दुकानें भी जलती थीं। अगर हिंदुओं के घर जलते थे, तो मुस्लिमों के घर भी जलते थे। और 2017 के बाद दंगे बंद हो गए।"
आदित्यनाथ ने कहा, "सम्भल में 64 तीर्थ स्थल हैं, और हमें 54 मिले हैं... जो भी हो, हम ढूँढ़ लेंगे। हम दुनिया को बताएँगे कि सम्भल में क्या हुआ था?"
कासगंज हिंसा (जनवरी 2018)
गणतंत्र दिवस पर तिरंगा यात्रा के दौरान दो समुदायों के बीच झड़प हुई, जिसमें एक युवक की मौत हो गई और कई घायल हुए। यह घटना योगी के शासन के शुरुआती दिनों में हुई और इसे सांप्रदायिक तनाव का प्रतीक माना गया।
विश्लेषण: स्थानीय प्रशासन पर पक्षपात का आरोप लगा, और विपक्ष ने इसे सरकार की नाकामी बताया।
कानपुर हिंसा (जून 2022): जुमे की नमाज के बाद दो समुदायों के बीच पथराव और हिंसा हुई, जिसमें 36 लोग गिरफ्तार हुए। यह एक टीवी डिबेट में पैगंबर पर टिप्पणी के विरोध से शुरू हुई थी। यूपी के कई शहरों में तनाव फैल गया था। पैगंबर पर टिप्पणी बीजेपी की महिला नेता नूपुर शर्मा ने की थी।
विश्लेषण: सरकार ने त्वरित कार्रवाई की, लेकिन यह घटना धार्मिक भावनाओं के प्रति संवेदनशीलता और तनाव की मौजूदगी को दर्शाती है।
बहराइच हिंसा (अक्टूबर 2024):
दुर्गा मूर्ति विसर्जन के दौरान डीजे पर गाना बजाने को लेकर विवाद हुआ, जिसमें एक युवक की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इसके बाद पथराव और आगजनी हुई।
विश्लेषण: विपक्ष ने इसे प्रशासनिक विफलता और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का परिणाम बताया, जबकि सरकार ने इसे सुनियोजित साजिश करार दिया। योगी ने पीड़ित परिवार को न्याय का भरोसा दिया।
संभल हिंसा (नवंबर 2024): शाही जामा मस्जिद के कोर्ट-आदेशित सर्वे के दौरान हिंसा भड़की, जिसमें 4 लोगों की मौत हुई और कई वाहनों को आग लगा दी गई। हिंदू पक्ष का दावा था कि मस्जिद की जगह पहले मंदिर था। इसमें लोकल कोर्ट ने एक ही दिन में सर्वे का आदेश दिया और कोर्ट कमिश्नर फौरन उसी दिन सर्वे करने भी जा पहुंचा। उसके साथ हिंदू संगठनों की भीड़ थी जो उत्तेजक नारे लगा रही थी। यह भीड़ मस्जिद में घुस गई और नमाजियों को वहां पीटा। उसके बाद हिंसा शुरू हो गई।
विश्लेषण: यह घटना धार्मिक स्थलों पर बढ़ते विवाद और तनाव को उजागर करती है। विपक्ष ने सरकार पर मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने का आरोप लगाया, जबकि सरकार ने इसे कानून के तहत कार्रवाई बताया। संभल हिंसा में पुलिस पर एकतरफा कार्रवाई का आरोप भी लगा। वहां के डीएसपी अनुज चौधरी आज भी विवादों में हैं। जुमे की नमाज़ पर अनुज चौधरी का बयान अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बना।

"लव जिहाद" कानून (2020):
उत्तर प्रदेश धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत अंतरधार्मिक विवाहों पर सख्ती की गई। इसके तहत सैकड़ों मामले दर्ज हुए, ज्यादातर मुस्लिम पुरुषों के खिलाफ। आलोचकों का कहना है कि इस कानून से हिंदू-मुस्लिम संबंधों को तनावपूर्ण बनाने की कोशिश हुई।बुलडोजर कार्रवाई: 2024 तक 7,400 से अधिक घरों को तोड़ा गया, जिनमें ज्यादातर गरीब और मुस्लिम बहुल इलाकों के थे। मानवाधिकार समूहों ने इसे "टारगेटेड तोड़फोड़" कहा, जिससे साम्प्रदायिक तनाव बढ़ा।
मंदिर-मस्जिद विवाद
सम्भल, अयोध्या और अन्य स्थानों पर धार्मिक स्थलों को लेकर बढ़ते विवादों ने ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया। योगी ने इसे ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने की कोशिश बताया, लेकिन इसने मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा की भावना को बढ़ाया। सरकारी नीतियां, जैसे बुलडोजर कार्रवाई और "लव जिहाद" कानून, अल्पसंख्यकों में भय और अविश्वास पैदा करती हैं, जिससे सामाजिक एकता कमजोर हुई है। हिंदू-मुस्लिम विवाद त्योहारों, जुलूसों और धार्मिक स्थलों पर केंद्रित हो गए हैं।
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