‘शराब के शौक़ीन, एक उम्दा मोती, खु़श लहजे के आसमान के चौदहवीं के चाँद और इल्म की महफ़िल के सद्र। ज़हानत के क़ाफ़िले के सरदार। दुनिया के ताजदार। समझदार, पारखी निगाह, ज़मीं पर उतरे फ़रिश्ते, शायरे-बुजु़र्ग और आला। अपने फ़िराक़ को मैं बरसों से जानता और उनकी ख़ासियतों का लोहा मानता हूँ। इल्म और अदब के मसले पर जब वह ज़बान खोलते हैं, तो लफ़्ज़ और मायने के हज़ारों मोती रोलते हैं और इतने ज़्यादा कि सुनने वाले को अपनी कम समझ का एहसास होने लगता है। वह बला के हुस्नपरस्त और क़यामत के आशिक़ मिज़ाज हैं और यह पाक ख़ासियत है, जो दुनिया के तमाम अज़ीम फ़नकारों में पाई जाती है।’
फ़िराक़ गोरखपुरी : ‘सांप्रदायिक हिंदू, हिंदू जाति के लिये ख़तरनाक है…’
- साहित्य
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- 28 Aug, 2020

आज यानी 28 अगस्त को शायर-ए-आज़म फ़िराक़ गोरखपुरी के जन्मदिन पर ख़ास।
यह मुख़्तसर सा तआरुफ़ अज़ीम शायर फ़िराक़ गोरखपुरी का है। उनके दोस्त शायर-ए-इंक़लाब जोश मलीहाबादी ने अपनी आत्मकथा ‘यादों की बरात’ में फ़िराक़ का खाका खींचते हुए उनके मुताल्लिक ये सब बातें कही हैं।