राजनीतिक महाभारत का नया संस्करण तैयार हो रहा है। आधा दर्जन राष्ट्रीय और पचास से ज़्यादा क्षेत्रीय पार्टियों ने सामूहिक निर्देश शस्त्र - नया भारत समावेशी भारत, सहिष्णु भारत, समृद्ध भारत, मजबूत भारत और संयुक्त भारत जैसे नारों से लैस मैनिफेस्टो मिसाइल तैयार कर लिए हैं। पर क्या ये सब बाद में अपने शब्दों पर खरे उतरेंगे? और क्या ये ख़ूबसूरत शब्द भद्दी, गाली गलौज वाली, अपमानजनक, जातिवादी और ओछी भाषा पर भारी पड़ेंगे? लेकिन पिछले चुनाव का अनुभव यही कहता है कि ऐसा नहीं होगा। आने वाले दिनों में चुनाव प्रचार की यही भाषा होगी क्योंकि चुनाव अक्सर सकारात्मक वायदों के विपरीत नकारात्मक मुद्दों पर जीते जाते हैं। मीडिया घरानों के ख़जाने उन विज्ञापनों की चकाचौंध से भरे जाते हैं जो सरकारों की कामयाबियों की कहानियाँ बयाँ करते हैं। जल्द ही चमचमाते कार्यक्रमों में नए मेनिफेस्टों और विज़न डाक्यूमेंट्स रिलीज़ किए जाएँगे। जैसा कि पूर्व उप प्रधानमंत्री देवीलाल चुटकी लेकर कहते थे 'सिर्फ मेनिफेस्टो के कवर पर नई तस्वीर लग जाती है, शेष वैसे का वैसा ही रहता है क्योंकि वायदे कभी पूरे नहीं होते।' संदेश बहुत स्पष्ट है कि कवर के आधार पर मेनिफेस्टो की पड़ताल मत करना।