किसानों से बातचीत में पराली जलाने वालों पर जुर्माने का प्रावधान रद्द करने पर केंद्र सरकार की रजामंदी से उसके द्वारा आनन-फानन में एनसीआर प्रदूषण नियंत्रण आयोग के गठन के पीछे उसकी नीयत पर सवालिया निशान लग रहा है। जुर्माना रद्द करने संबंधी बयान कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने 30 दिसंबर को किसान संगठनों से बातचीत के बाद दिया है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र एवं संबंधित क्षेत्रों में पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण संबंधी अध्यादेश अक्टूबर में जारी किया गया था। इसके मुताबिक़, वायु प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार लोगों को अधिकतम एक करोड़ रुपए ज़ुर्माना और ज़्यादा से ज़्यादा पाँच साल कैद की सज़ा हो सकती है।
आजकल तो पंजाब—हरियाणा में पराली नहीं जल रही फिर भी दिल्ली—एनसीआर की हवा में पदार्थ कणों की मात्रा 400 पार कर रही है। दिल्ली की हवा फिर धूलकणों से भरी और ईंधन के धुएं से ज़हरीली है। इससे साफ़ है कि केंद्र सरकार द्वारा अक्टूबर में अध्यादेश लाकर प्रदूषण नियंत्रण आयोग बनाए जाने की उपयोगिता कितनी सीमित है। सुप्रीम कोर्ट भी इशारों—इशारों में केंद्र सरकार को यह जता चुका कि इसके पीछे छिपी मंशा को वह बखूबी भांप रहा है। दरअसल सुप्रीम कोर्ट अपने रिटायर न्यायाधीश न्यायमूर्ति मदन लोकुर की सदारत में एनसीआर प्रदूषण निगरानी समिति बनाना चाहता था मगर सरकार ने उससे बचने की जल्दबाज़ी में उक्त अध्यादेश पर राष्ट्रपति से दस्तखत करवा के क़ानून बना लिया।
सुप्रीम कोर्ट ने सर्दियों की छुट्टी से पहले 18 दिसंबर की सुनवाई में नवगठित आयोग की हवा की गुणवत्ता संबंधी रिपोर्ट को नाकाफी बताकर उस पर नाराजगी जताई। सर्वोच्च अदालत ने पूछा कि आयोग आख़िर तीन महीने से कर क्या रहा था? केंद्र सरकार के वकील के अनुसार आयोग दिल्ली में प्रदूषित वायु को साफ़ करने के लिए विभिन्न एजेंसियों के साथ बैठक की है। साथ ही आयोग द्वारा आईआईटी दिल्ली, मौसम विभाग और उष्णकटिबंधीय मौसम संस्थान को साथ लेकर वायु गुणवत्ता के लिए आपातकालीन उपाय तय करने को निर्णय समर्थन प्रणाली विकसित करने का जुगाड़ बैठा रहा है।
यह प्रणाली ही तय करेगी कि वायु की गुणवत्ता का क्या स्तर तय किया जाए? प्रदूषण की अधिकतम सीमा क्या होनी चाहिए? उसे कैसे परिभाषित किया जाए?
वायु प्रदूषण रोकने के लिए जो उपाय किए गए हैं, उनमें पराली जलाने का चलन रोकने का जुर्माना भी शामिल है। यदि पराली जलाने पर जुर्माने से छूट संबंधी किसानों की मांग सरकार मान लेती है तो सुप्रीम कोर्ट को क्या जवाब देगी?
क्या सरकार ने पराली जलाने का चलन रोकने को कोई ठोस कार्य योजना बनाई है? ऐसा क़तई नहीं है, क्योंकि केंद्र सरकार ख़ुद ही पिछले पखवाड़े सुप्रीम कोर्ट को बता चुकी कि आयोग तीन महीने से हालात का जायज़ा ही ले रहा है। आयोग तो दीवाली पर दिल्ली—एनसीआर में पटाखे नहीं जलने देने संबंधी केंद्रीय हरित प्राधिकरण के आदेश पर अमल कराने में भी सरासर नाकाम रहा। दिल्ली—एनसीआर में वायु प्रदूषण ख़तरे के निशान 250 पीएम से अधिक होने पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने पटाखे फोड़ने पर 30 नवंबर तक सख्ती से रोक लगाने का आदेश केंद्र सरकार को दिया। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने महज दो घंटे ग्रीन पटाखे छुड़ाने की अनुमति दी मगर आयोग दिल्ली पुलिस से इसे लोगों से मनवा ही नहीं पाई!
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इस आपराधिक लापरवाही की क़ीमत दिल्ली की जनता ने बीते नवंबर में कोविड—19 महामारी के नए सिरे से गहराए प्रकोप को झेलकर चुकाई। दिल्ली में स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक़, नवंबर के तीसरे हफ्ते में संक्रमण से 625 लोगों की मौत हुई। दिल्ली की कुल मृत्यु दर नवंबर के आख़िरी हफ्ते में 1.57% पार कर चुकी थी। दिल्ली में महामारी संक्रमितों की औसत संख्या नवंबर के एक ही पखवाड़े में 5000 प्रतिदिन और 20 दिनों में क़रीब दो हज़ार लोगों की मौत तक जा पहुँची थी।
इसके बावजूद प्रदूषण की रोकथाम की कोई आपात योजना नहीं बनाई गई। ताज्जुब यह कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन, उपराज्यपाल अनिल बैजल और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल वगैरह ने प्रदूषण की रोकथाम पर कोई चर्चा ही नहीं की।
तभी यह साफ़ हुआ कि केंद्र और दिल्ली सरकारों का राजनीतिक नेतृत्व राजधानी में दमघोंटू प्रदूषण रोकने के प्रति गंभीर नहीं है जिसकी पराली जलाने पर जुर्माना रद्द करने से पुष्टि हो रही है।
महामारी काल में लॉकडाउन से वाहनों एवं विमानों का यातायात रुकते ही कुदरत अपने मोहक रूप में लौटी थी, उससे यह सिद्ध होता है कि अनुशासन एवं संयम द्वारा राजधानी को प्रदूषण के प्रकोप से बचाया जा सकता है। जरा याद करिए कि अप्रैल से जून 2020 के बीच प्रकृति ने कैसे सबको मंत्रमुग्ध कर दिया था। लोगों ने आए दिन समाचार सुने—पढ़े और तसवीरें देखीं। सहारनपुर से शिवालिक के शुभ्र धवल शिखर दिखाई दिए तो जालंधर से हिमालय की गगनचुंबी सुनहली चोटियाँ लोगों ने बिना दूरबीन निहारीं। हरिद्वार में तो गजराज हरकी पैड़ी पर नहाने ही आ पहुँचे।
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राजधानी दिल्ली में लगातार दो महीने धूलकणों से मुक्त साफ़ हवा बहने का रिकॉर्ड बन गया। घरों की बालकनियों को दिल्ली में बाय—बाय कर चुकी गौरैया ने लॉकडाउन के दौरान फिर से गमलों के पौधों में फुदक कर लोगों को बख़ूबी अपनी उपस्थिति का सुखद अहसास कराया। प्रकृति ने मनुष्य जाति को अहसास कराया कि यदि वे प्रदूषण फैलाने से बाज रहे तो वह फिर अपने निर्मल और कोमल तत्व से उनकी ज़िंदगी खुशगवार बना सकती है।
कुदरत का यह स्पष्ट संदेश रहा कि मनुष्यों को असीमित उपभोग की उद्दाम लालसा से पिंड छुड़ाकर महात्मा गांधी के तालिस्मान को याद रखना होगा। बापू ने कहा था कि मनुष्यों का पेट भरने और उनकी ज़रूरत पूरी करने की कुदरत के पास कोई कमी नहीं है मगर अंधाधुंध उपभोग से प्रकृति का विनाश तय है। महामारी के डर से उबर कर लोगों ने जैसे ही अपने वाहन सड़कों पर उतारे परिंदे अपने पर फैला कर बस्तियों से फुर्र हो गए और जानवर अपने जंगलों की हरियाली में जा दुबके।
यदि निर्वाचित सरकारों को इतना महत्वपूर्ण फर्क भी दिखाई नहीं देता तो फिर प्रदूषण की प्रभावी रोकथाम के लिए समीचीन उपाय वे कैसे कर पाएँगी?
वैसे भी केंद्र सरकार द्वारा गठित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र एवं आसपास क्षेत्र में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने वायु प्रदूषण रोकने के लिए अभी उँगली तक नहीं हिलाई। नवगठित आयोग के अध्यक्ष एमएम कुट्टी हैं जो दिल्ली के मुख्य सचिव रहे हैं। आयोग में आईआईटी दिल्ली के प्रोफ़ेसर मुकेश खरे और भारतीय मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक रमेश के जे पूर्णकालिक तकनीकी सदस्य हैं। आयोग का कार्यक्षेत्र दिल्ली—एनसीआर से जुड़े पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के उन इलाक़ों तक है जहाँ वायु प्रदूषण की गतिविधियाँ हो रही हैं। आयोग के 20 सदस्यों में सभी संबद्ध राज्यों के अधिकारी शामिल हैं।
हरियाणा और पंजाब में अब तो पराली जलना भी बंद हो चुका मगर 450 पीटीएम पार कर चुका वायु प्रदूषण राजधानी के बाशिंदों का लगातार दम घोंट रहा है। इससे साफ़ है कि दिल्ली के प्रदूषण की जड़ अनियंत्रित बढ़ती वाहनों की संख्या में है। साथ ही राजधानी में नगर निगमों की केजरीवाल सरकार से लगातार खटपट के कारण स्थानीय सफ़ाई तंत्र का भट्टा बैठ गया है जिसकी ज़िम्मेदारी से उनमें सत्तारूढ़ बीजेपी क़तई नहीं बच सकती। इस क्षेत्र में घने हो रहे वायु प्रदूषण से बीमार होते बच्चों, बड़ों, बूढ़ों, गर्भवती माताओं की सुध लेने के बजाए आप और बीजेपी एक—दूसरे की टांग खींचने में व्यस्त हैं। इसी वजह से 1998 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एप्का यानी पर्यावरण प्रदूषण बचाव एवं नियंत्रण प्राधिकरण जैसी आधिकारिक संस्था भी दिल्ली में प्रदूषण पर रोक नहीं लगा पाई।
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