मध्य प्रदेश के खरगोन में रामनवमी पर भड़का सांप्रदायिक उन्माद थमने के बीच, गेहूं के साथ घुन के भी पिस जाने जैसी कहानियां हर दिन सामने आ रही हैं। खरगोन दंगों में ‘घुन’ की तरह पिस जाने वालों में कुछ हिन्दू भी हैं, लेकिन मुसलिमों की संख्या बहुत ज्यादा है। ऐसी ही कहानियों की फेहरिस्त में नाम जुड़ा है, 38 साल के वसीम अहमद शेख का।
वसीम शेख की कहानी बेहद दर्दनाक और मन को झकझोर देने वाली है। वे हुनरमंद थे। पेंटिंग (पुताई) का काम किया करते थे। काम करते हुए 17 साल पहले बिजली के झटके ने उनके सपनों को बिखेर दिया था।
दुर्घटना में दोनों हाथों को खो देने के बाद भी वसीम ने हार नहीं मानी। संघर्ष करते रहे।
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इस गुमटी में पतंग, गोली-बिस्किट और आम जरूरतों का अन्य छिटपुट समान बेचकर आत्म निर्भर बनने के प्रयास में वसीम जुट गए थे।
वसीम बताते हैं, बेवा मां, पत्नी और दो बच्चों की जैसे-तैसे गुजर-बसर गुमटी से हो रही थी।
वसीम के अनुसार, मुक़ीम खान की जमीन पर वे बीते 12 सालों से गुमटी चला रहे थे। मगर रामनवमी पर खरगोन में हुए दंगों ने एक बार फिर उन्हें (वसीम को) उसी चौराहे पर ला खड़ा किया, जहां 17 साल पहले दोनों हाथ गंवाने के बाद आ खड़े हुए थे।
वसीम लाचारी जताते हुए कहते हैं, ‘आगे क्या करूंगा? घर कैसे चलेगा? बच्चों-परिवार का भरण-पोषण कैसे होगा? बच्चे आगे स्कूल कैसे जा पायेंगे? ये सारे सवाल उनके मन-मस्तिष्क में थमने का नाम नहीं ले रहे हैं।’
वसीम कहते हैं, ‘पत्थर फेंकने वालों के घरों को पत्थर के ढेर में बदल देने की सरकार की घोषणा सरकार ने की थी। मगर मैंने तो कोई पत्थर नहीं चलाया था। लेकिन मेरी रोजी-रोटी (गुमटी) को धूल में क्यों मिला दिया, समझ नहीं पा रहा हूूं।’
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कार्रवाई से पहले मुझे एक अदद नोटिस दे दिया जाता तो मैं हकीकत प्रशासन के सामने रख देता। गुमटी हटा लेता।
वसीम अहमद शेख
अफसर का बयान
वसीम की गुमटी पर बुलडोजर चलवाने वाले अफसर अब अजीब सी दलील दे रहे हैं। कार्रवाई के लिए जिम्मेदार तहसीलदार योगेन्द्र सिंह ने मीडिया से कहा है, ‘सरकारी जमीन पर गुमटी वर्षों से खाली पड़ी हुई थी। रिकार्ड में इसका कहीं कोई उल्लेख नहीं था। संबंधित व्यक्ति या किसी अन्य ने भी गुमटी को लेकर संपर्क नहीं किया।’
अफसर यह भी कह रहे हैं, ‘कार्रवाई हो जाने के बाद संबंधित व्यक्ति टूटी हुई गुमटी को अपना बताकर भ्रम पैदा कर रहा है।’
प्रशासन से लड़ रहे हैं: मुक़ीम
मुक़ीम खान का कहना है, ‘दिव्यांग होने की वजह से वसीम को गुमटी लगाने की जगह अपनी जमीन पर उन्होंने दी थी। पांच लोगों के परिवार का पालन-पोषण गुमटी से वसीम कर रहा था।’
मुक़ीम आगे बताते हैं, ‘वे और उनके आस-पड़ोस के कई लोग प्रशासन से लड़ रहे हैं। सारे दस्तावेज़ होने के बावजूद जमीन को सरकारी बताया जा रहा है। कागज़ होने के बाद भी उनके सहित सात लोगों को नोटिस दिए गए। कोर्ट से राहत मिली तो कार्रवाई रूक गई। मगर कुछ समय से प्रशासन एक बार फिर हम सभी को हटाने की कोशिश में जुटा हुआ है।’
मुक़ीम कहते हैं, ‘हालिया दंगों के बाद प्रशासन ने वसीम की गुमटी को तोड़ दिया है। वसीम के सामने अब स्वयं, और परिवार की रोजी रोटी का बड़ा संकट पैदा हो गया है।’
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