मध्य प्रदेश में कांग्रेस के एक वरिष्ठ विधायक को बिना इस्तीफा मंजूर हुए मोहन यादव सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाये जाने पर बवाल खड़ा हो गया है। कांग्रेस ने विधानसभा स्पीकर नरेन्द्र सिंह तोमर और राज्यपाल मंगूभाई पटेल को कठघरे में खड़ा करते हुए इसे लोकतंत्र की हत्या करार दिया है। इसे लेकर शिकायतों का दौर भी तेज हो गया है। कांग्रेस पूरे मामले को लेकर कोर्ट जाने की बात कह रही है।
श्योपुर जिले की विजयपुर सीट से 6 बार के विधायक रामनिवास रावत को मोहन यादव सरकार में मंत्री बनाया गया है। सोमवार सुबह 9 बजे राजभवन में आयोजित एक सादे समारोह में राज्यपाल मंगू भाई पटेल ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई है। शपथ ग्रहण के बाद कांग्रेस आक्रामक हो गई है। मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष जीतू पटवारी, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और उपनेता हेमंत कटारे ने अलग-अलग आपत्तियां दर्ज कराते हुए सरकार को घेरा है। हेमंत कटारे ने विधानसभा के स्पीकर तोमर को लिखित शिकायत की है। कई सवाल उन्होंने अपनी शिकायत में उठाये हैं।
यह स्थापित परंपरा है कि सरकार और विपक्ष अलग होते हैं, लेकिन लोकतंत्र की हत्या व कुर्सी की सौदेबाज़ी के लिए कुख्यात @BJP4India ने कांग्रेस विधायक को ही मंत्री पद की शपथ दिला दी! यह लोकतंत्र और संविधान का प्रमाणिक अपमान है!
— Jitendra (Jitu) Patwari (@jitupatwari) July 8, 2024
जबकि, कांग्रेस विधायक रामनिवास रावत की विधानसभा सदस्यता…
रावत का 68 दिनों बाद हुआ पुनर्वास
रामनिवास रावत 30 अप्रैल 2024 को भाजपा में शामिल हुए थे। लोकसभा चुनाव के दौरान मुरैना में आयोजित चुनावी सभा के दौरान रावत ने भाजपा का दुपट्टा पहन लिया था। मुख्यमंत्री मोहन यादव और प्रदेशाध्यक्ष वी.डी. शर्मा ने उन्हें भाजपा ज्वाइन कराई थी। ज्वानिंग कमेटी के सदर पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा भी मौजूद रहे थे।
मध्य प्रदेश की कुल 29 लोकसभा सीटों में जिन सीटों पर पार्टी की भाजपा की हालत खस्ता मानी जा रही थी, उसमें मुरैना भी शामिल थी। मुरैना सीट को 2019 के चुनाव में नरेन्द्र सिंह तोमर ने जीता था। विधायक बन जाने के बाद टिकट तोमर के निकटवर्ती शिवमंगल सिंह तोमर को दिया गया था। हालत पतली देखते हुए भाजपा ने तोड़फोड़ की थी। कांग्रेस के कई नेताओं को तोड़ा गया था। ऐसे नेताओं में रामनिवास रावत भी शामिल रहे थे। भाजपा ने न केवल मुरैना बल्कि राज्य की सभी 29 सीटों पर जीत दर्ज की थी।
मुरैना में मिली जीत में रामनिवास रावत का भी अहम योगदान रहा था। विजयपुर सीट पर भाजपा को उल्लेखनीय बढ़त मिली थी। बहरहाल, रावत को सोमवार 8 जुलाई को मंत्री बना दिये जाने को भाजपा को लोकसभा चुनाव में दी गई मदद का ‘प्रतिफल’ माना जा रहा है। हालाँकि कांग्रेस तंज कसते हुए कह रही है, ‘डील पूरी हो गई।’
मध्यप्रदेश की बीजेपी सरकार ने कांग्रेस विधायक को मंत्री बनाया है। लोकतंत्र के हत्यारों को अब इतनी भी परवाह नहीं कि कम से कम मंत्री बनाने से पहले कांग्रेस से इस्तीफ़ा तो दिला देते।
— MP Congress (@INCMP) July 8, 2024
ज्योतिरादित्य सिंधिया को चीख चीखकर ग़द्दार कहने वाले रामनिवास रावत खुद भी उसी क़तार में खड़े हो गये… pic.twitter.com/N3xhIvIchC
मध्य प्रदेश विधानसभा सचिवालय ने की पुष्टि
इस मामले को लेकर ‘सत्य हिन्दी’ ने मध्य प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव एपी सिंह से संपर्क किया तो उन्होंने बताया, ‘सचिवालय को रावत का इस्तीफा अभी मिला नहीं है। संभवतः इस्तीफा उन्होंने स्पीकर को दिया होगा।’
कोई भी विधायक इस्तीफा देता है तो इस्तीफा आने के बाद विधायक से पुष्टि की जाती है। पूछा जाता है, कोई दबाव तो नहीं है। यदि स्वेच्छा से त्यागपत्र की बात की जाती है तो उसे मंजूर कर लिया जाता है।
इस्तीफा मंजूर होने के बाद अधिसूचना जारी होती है। राजपत्र में इसका प्रकाशन होता है। चुनाव आयोग को सूचना दी जाती है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद चुनाव आयोग सीट को रिक्त घोषित करता है।
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कमलनाथ निशाने पर?
रामनिवास रावत को आनन-फानन में मंत्री बनाये जाने को लेकर जो सवाल उठाये जा रहे हैं, उसमें एक बड़ा सवाल जल्दबाजी से जुड़ा है। सवाल हो रहा है कि इस्तीफा मंजूर कराने की प्रक्रिया पहले ही क्यों नहीं करा ली गई? इस सवाल का माकूल जवाब सरकार की ओर से नहीं आया है।
माना यह जा रहा है कि छिन्दवाड़ा जिले की अमरवाड़ा सीट इस जल्दबाजी की बड़ी वजह है। दरअसल अमरवाड़ा सीट लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस विधायक कमलेश शाह के भाजपा ज्वाइन कर इस्तीफा दे देने की वजह से खाली हुई है।
इस सीट के लिए उपचुनाव हो रहा है। अमरवाड़ा में 10 जुलाई को वोटिंग होने वाली है और 13 जुलाई को नतीजे आना है। कहा जा रहा है कि अमरवाड़ा में अब भाजपा के प्रत्याशी कमलेश शाह की हालत पतली है। कमलनाथ ने इस सीट पर कांग्रेस को जिताने के लिए पूरी ताकत अपने समर्थकों के साथ झोंक रखी है।
दो बार ली रावत ने शपथ
रामनिवास रावत को राज्यपाल को दो बार शपथ दिलानी पड़ी। उन्हें मंत्री पद दिया गया था। शपथ लेते वक्त रावत राज्यमंत्री पद की शपथ ले गए। तकनीकी त्रुटि स्पष्ट हुई तो राज्यपाल ने उन्हें पुनः शपथ दिलाई और दूसरी बार में उन्होंने राज्य के मंत्री के तौर पर शपथ ली।
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