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वक्फ विधेयक पर सोनिया के बयान से बीजेपी बौखलाई, माफी की मांग क्यों?

वक्फ संशोधन विधेयक के संसद से पारित होने के बाद बीजेपी और कांग्रेस के बीच तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है। बीजेपी ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से उनके हालिया बयान पर माफी की मांग की है। इसने संसद में सोनिया के बयान का मुद्दा उठाया। बयान में सोनिया ने इस विधेयक को 'संविधान पर एक निर्लज्ज हमला' क़रार दिया था। यह विवाद तब शुरू हुआ जब सोनिया गांधी ने गुरुवार को कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में कहा कि यह बिल लोकसभा में जबरन पारित कराया गया और यह बीजेपी की 'समाज के स्थायी ध्रुवीकरण की रणनीति' का हिस्सा है। 

सोनिया गांधी ने अपनी टिप्पणी में वक्फ बिल को संविधान के मूल ढांचे पर हमला बताया और इसे बीजेपी की विभाजनकारी नीति का हिस्सा कहा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार ने इस विधेयक को लोकसभा में 12 घंटे की बहस के बाद देर रात 'बुलडोजर की तरह पारित कराया'। उन्होंने विधेयक को लोकसभा में जल्दबाजी और जबरदस्ती पारित करने के संदर्भ में यह इस्तेमाल किया। इसका मतलब है कि उनकी नज़र में यह विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा या सहमति के थोपा गया। 'स्थायी ध्रुवीकरण' से उनका इशारा बीजेपी की उस कथित नीति की ओर है, जो हिंदू-मुस्लिम या अन्य समुदायों के बीच तनाव को बढ़ावा देती है ताकि उसका राजनीतिक लाभ उठाया जा सके। 

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सोनिया के इस बयान पर बीजेपी सांसदों ने शुक्रवार सुबह लोकसभा में 'सोनिया गांधी माफी मांगो' के नारे लगाए, जिसके चलते सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कहा, 'सोनिया गांधी ने बीजेपी पर देश को गटर में ले जाने का आरोप लगाया, जो संविधान पर हमला है। उन्हें इसके लिए माफी मांगनी चाहिए।'

केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी सोनिया के बयान की आलोचना की और कहा, 'हमने सभी प्रक्रियाओं का पालन किया। लोकसभा में 12 घंटे और राज्यसभा में 17 घंटे की बहस हुई, बिना किसी व्यवधान के। इसे बुलडोज करना कहना ग़लत है। यह संसद का अपमान है।' लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी सोनिया की टिप्पणी को 'अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण' बताया और कहा कि एक वरिष्ठ नेता का संसद की प्रक्रिया पर सवाल उठाना लोकतंत्र की गरिमा के खिलाफ है।

वक्फ संशोधन विधेयक को लोकसभा ने 288-232 और राज्यसभा ने 128-95 मतों से पारित किया। सरकार का दावा है कि यह विधेयक वक्फ संपत्तियों में पारदर्शिता लाएगा और गरीब मुस्लिमों के हित में है। इसमें गैर-मुस्लिम सदस्यों को वक्फ बोर्ड में शामिल करने, कलेक्टर को संपत्ति विवादों में अंतिम निर्णय का अधिकार देने, और 'वक्फ बाय यूजर' की अवधारणा को हटाने जैसे प्रावधान हैं। विपक्ष ने इसे असंवैधानिक और मुस्लिम विरोधी करार दिया है, जबकि बीजेपी इसे ऐतिहासिक सुधार बताती है।
बीजेपी की माफ़ी की मांग को सिर्फ़ सोनिया गांधी के बयान तक सीमित नहीं देखा जा सकता है। यह एक बड़े राजनीतिक संदर्भ का हिस्सा है। बीजेपी इस मुद्दे को कांग्रेस के ख़िलाफ़ आक्रामक रुख अपनाने और अपनी हिंदुत्व नीति को मज़बूत करने के अवसर के रूप में इस्तेमाल कर रही है।

सोनिया गांधी का बयान बीजेपी को यह मौक़ा देता है कि वह कांग्रेस को मुस्लिम तुष्टिकरण के पुराने आरोप में फिर से घेरे। साथ ही, यह विधेयक एनडीए के सहयोगियों जैसे जेडीयू और टीडीपी के समर्थन के बावजूद विवादास्पद बना हुआ है, और बीजेपी इस बहस को अपने पक्ष में मोड़ना चाहती है।

कांग्रेस ने इस माफी की मांग को खारिज करते हुए कहा कि सोनिया गांधी ने जो कहा, वह उनकी पार्टी की स्पष्ट स्थिति को दिखाता है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा, 'हम इस विधेयक की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे। यह संविधान और अल्पसंख्यक अधिकारों पर हमला है। बीजेपी का माफी मांगने का ड्रामा सिर्फ ध्यान भटकाने की कोशिश है।' कांग्रेस का दावा है कि बीजेपी संसद में विपक्ष की आवाज़ को दबाने की कोशिश कर रही है, जैसा कि सोनिया ने अपनी टिप्पणी में भी कहा था कि लोकसभा और राज्यसभा में विपक्षी नेताओं को बोलने नहीं दिया जा रहा।

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यह विवाद कई स्तरों पर राजनीतिक असर डाल सकता है।

  • कांग्रेस इस मुद्दे पर डीएमके, टीएमसी और सपा जैसे दलों को साथ लाने की कोशिश कर रही है, जो पहले से ही वक्फ बिल का विरोध कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में चुनौती इस एकता को मजबूत कर सकती है।
  • बीजेपी इस विवाद को अपने हिंदू वोटबैंक को एकजुट करने के लिए इस्तेमाल कर सकती है, खासकर तब जब वह इसे संविधान की रक्षा के नाम पर पेश कर रही है।
  • जेडीयू और टीडीपी जैसे सहयोगी दलों के लिए यह विधेयक पहले ही चुनौती बन चुका है। सोनिया के बयान और बीजेपी की प्रतिक्रिया उनके मुस्लिम वोटबैंक को और प्रभावित कर सकती है।

बीजेपी की सोनिया गांधी से माफी की मांग इस वक्फ बिल विवाद को कानूनी से ज्यादा राजनीतिक रंग दे रही है। जहां बीजेपी इसे अपनी नीति की जीत के रूप में पेश करना चाहती है, वहीं कांग्रेस इसे संविधान और अल्पसंख्यक अधिकारों की लड़ाई बना रही है। सुप्रीम कोर्ट में इसकी सुनवाई और बिहार जैसे राज्यों में इसका असर आने वाले दिनों में इसकी दिशा तय करेगा।

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क़मर वहीद नक़वी
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