प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हाल में नागपुर-स्थित आरएसएस मुख्यालय पहुंचे। वहां उन्होंने आरएसएस के संस्थापक डॉ. के.बी. हेडगेवार और द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर को श्रद्धांजलि दी। इस यात्रा का खूब प्रचार हुआ और इसकी सर्वत्र चर्चा हो रही है। कुछ लोगों का कयास है कि चूँकि अगले सितम्बर में मोदी 75 साल के हो जाएंगे और अपनी पार्टी के नियमों के अनुसार उन्हें सक्रिय राजनीति से संन्यास लेना होगा, इसलिए यह उनकी फेयरवेल यात्रा थी!
इस बीच कई घटनाओं से ऐसा लग रहा है कि पिता (आरएसएस) और बेटे (भाजपा) के रिश्तों में कुछ खटास आ गयी है। सन 2024 के आमचुनाव से पहले भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने कहा था कि भाजपा अब अपने पैरों पर खड़ी हो गयी है और उसे आरएसएस के समर्थन की ज़रूरत नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि इसके पहले तक भाजपा इतनी मज़बूत नहीं थी इसलिए उसे वोट हासिल करने के लिए आरएसएस की मदद की दरकार रहती थी।
एक दूसरा मसला है मोदी का आसमान छूता अहंकार। उन्होंने कहा कि वे 'नॉन-बायोलॉजिकल' हैं और ईश्वर ने उन्हें इस धरती पर अपना दूत बनाकर भेजा है। संघ के मुखिया मोहन भागवत को लगा कि मोदी का अहं बहुत ज्यादा बढ़ गया है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से टिप्पणी की कि कुछ लोग खुद को देवता और फिर भगवान मानने लगते हैं।
लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटों में कमी आई। ऐसा माना जाने लगा कि आरएसएस ने चुनाव में पूरा जोर नहीं लगाया और इसलिए भाजपा को नुकसान हुआ। मगर फिर महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों में आरएसएस, भाजपा के समर्थन में कूद पड़ा। जहाँ तक आरएसएस का प्रश्न है, सिवाय 1984 के चुनाव के, जब संघ को लगने लगा था कि खालिस्तान आन्दोलन भारत की एकता के लिए ख़तरा है, उसने बीजेपी का साथ दिया है और उसे वोट दिलवाने में मदद की है।
मुख़र्जी के देहांत के बाद संघ ने धीरे-धीरे जनसंघ पर कब्ज़ा जमा लिया। इससे आरएसएस को अपने अधीन काम करने वाला एक विशुद्ध राजनैतिक संगठन हासिल हो गया। आरएसएस, भाजपा और संघ के अन्य बाल-बच्चों के बीच एकदम स्पष्ट श्रम विभाजन है।
इसका सबसे बढ़िया उदाहरण था 1980 के दशक में विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा शुरू किया गया राममंदिर आन्दोलन। भाजपा ने इस आन्दोलन को अपने हाथों में ले लिया और उसके ज़रिये जमकर वोट कबाड़े। आरएसएस लगातार प्राचीन भारत का महिमामंडन करता है और धार्मिक अल्पसंख्यकों सहित समाज के कमज़ोर वर्गों जैसे दलितों, आदिवासियों और महिलाओं के बारे में गलत धारणाएं फैलाता है। उसकी सबसे बड़ी ताकत है उसकी शाखाओं का विशाल जाल और लोगों से जुड़ने की उसकी कई कार्यविधियाँ।
यद्यपि भारत का सामंती और औपनिवेशिक समाज अब प्रजातान्त्रिक बन चुका है मगर आरएसएस अब भी अपनी शाखाओं के ज़रिये राजे-रजवाड़ों के दौर में व्याप्त जातिगत और लैंगिक ऊंचनीच और सामंती मूल्यों को बढ़ावा देता है। उससे जुड़े एकल विद्यालय, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती, राष्ट्रसेविका समिति आदि भी यही काम करते हैं।
समाज के विभिन्न तबकों और राजनैतिक ढांचे में घुसपैठ करने का काम आरएसएस बहुत लम्बे समय से कर रहा है। मगर पहले राज्यों और अब केंद्र में भाजपा के सत्ता में आने से इस प्रक्रिया में जबरदस्त तेजी आई है। अब संघ अपनी विचारधारा को और फैलाने के लिए महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के समूह गठित कर रहा है। मैं मुंबई के जिस इलाके में रहता हूँ, वहां संघ ने हाल में एक पिकनिक का आयोजन किया। एक मुस्लिम महिला उसमें भाग लेना चाहती थी मगर उसे सीधे-सीधे कह दिया गया कि पिकनिक के दौरान जो बातें की जाएंगी उससे वो असहज महसूस करेगी। सुबह-सुबह हाथों में लाठियाँ लिए जाती महिलाओं को देखकर आप यह समझ सकते हैं कि वे राष्ट्र सेविका समिति की शाखा में जा रही हैं।
पिछले एक दशक के भाजपा शासन में आरएसएस के अपने हिन्दू राष्ट्रवादी एजेंडा के कई लक्ष्य हासिल कर लिए हैं। राममंदिर बन चुका है, अनुच्छेद 370 हटाया जा चुका है, मुंहजबानी तलाक गैरकानूनी घोषित किया जा चुका है और राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (एनआरसी) तैयार करने की प्रक्रिया शुरू हो गयी है। वक्फ के मामले में संसद में बहस चल रही है।
यह साफ़ है कि आरएसएस और भाजपा के बीच कोई विवाद या असहमति नहीं है। ज्यादा से ज्यादा यह हो सकता है कि दोनों के बीच हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए अपनाई जाने वाली रणनीति के मामले में कुछ मतभेद हों।
मोदी ने हेडगेवार और गोलवलकर की तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने देश को सही राह दिखाई। वह राह क्या है? पहली तो यह कि आज़ादी, बराबरी और भाईचारे के मूल्यों को सबसे ज्यादा अहमियत देने वाले भारतीय राष्ट्रवादी आन्दोलन से सुरक्षित दूरी बनाई रखी जाए। दूसरे बिना स्वीकार करे गोलवलकर के इस सिद्धांत का पालन किया जाए कि मुसलमान, ईसाई और कम्युनिस्ट हिन्दू राष्ट्र के दुश्मन हैं। इस साल (2025) की ईद-उल-फ़ित्र इसका उदाहरण हैं। एक राज्य में उसे सार्वजनिक की बजाय ऐच्छिक छुट्टी घोषित कर दिया गया। सड़क पर नमाज़ अदा करने का विरोध किया जा रहा है और पुलिस नमाजियों के खिलाफ बलप्रयोग कर रही है।
जहाँ तक ईसाइयों का सवाल है, ओडिशा में उनके शवों को दफनाना मुश्किल बना दिया गया है। बालासोर जिले में सरना माझी नामक एक आदिवासी संस्था यह बेबुनियाद दावा कर रही है कि संविधान के अनुच्छेद 13(3)ए के अंतर्गत आदिवासी ईसाइयों को उनके गांवों में अपने लोगों का शव दफ़न करने का हक़ नहीं है। (बालासोर की यात्रा पर गयी एक तथ्यान्वेषण समिति की रपट)।
मोदी बार-बार कह रहे हैं कि भारत विकसित हो रहा है। शायद वह आरएसएस की विचारधारा के परिप्रेक्ष्य से विकसित हो रहा होगा। मगर आनंद, धार्मिक स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता, प्रजातंत्र और भूख से सम्बंधित मानकों में तो उसकी स्थिति गिरती ही जा रही है। शायद विकास से मोदी का आशय यह है कि कुछ चुनिन्दा घराने और रईस होते जायें और वे या तो यहाँ के कानूनों का मखौल बनाते रहें या बैंकों से अरबों का कर्ज लेकर विदेश भाग जाएँ। जाहिर है कि कथनी और करनी में भारी भेद है।
मोदी की नागपुर यात्रा के राजनैतिक निहितार्थ हैं। उन्होंने वहां जो किया और कहा वह एक राजनैतिक प्रहसन है जिसका उद्देश्य वोट हासिल करना है।
(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया। लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)
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