मध्य प्रदेश में संक्रमण के दौर से गुज़र रही कांग्रेस को पूरी तरह से समाप्त करने की कोई कवायद हो रही है? यह सवाल केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) की रिपोर्ट पर चुनाव आयोग के ताज़ा दिशा-निर्देश के बाद से मध्य प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में तेज़ी से गूँज रहा है।
लोकसभा चुनाव 2019 से ठीक पहले मध्य प्रदेश में पड़े आयकर छापों के मामले में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड की रिपोर्ट पर कार्रवाई करते हुए चुनाव आयोग ने प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह शक के घेरे में आए सभी तत्कालीन मंत्रियों और अफ़सरों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करे।
सीबीडीटी की रिपोर्ट में तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ के कई क़रीबियों के अलावा कांग्रेस के कई तत्कालीन मंत्रियों, मध्य प्रदेश के आईएएस और आईपीएस अफ़सरों के नाम दिए गए हैं।
सूत्रों का कहना है कि पहले एक पूर्व वरिष्ठ आईएएस अफ़सर, तीन सीनियर आईपीएस और एक राज्य पुलिस सेवा के अधिकारी पर केस दर्ज होगा। जाँच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, इसके घेरे में बाक़ी लोग भी आएँगे।
सीबीडीटी की रिपोर्ट के बाद मध्य प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और कांग्रेस की घेराबंदी को राज्य से कांग्रेस के पूरे सफ़ाये से जोड़कर देखा जा रहा है। कांग्रेस साल 2018 के विधानसभा चुनाव में 15 सालों के बाद सत्ता में लौटी थी।
कमलनाथ ने अगुवाई की थी और जोड़तोड के बाद बनी सरकार के वे मुखिया (मुख्यमंत्री) बनाये गये थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया से खटपट के चलते मार्च 2020 में कमलनाथ की सरकार चली गई थी। सिंधिया ने बग़ावत का बिगुल फूँका था। कुल दो दर्जन से ज़्यादा कांग्रेस विधायकों ने कांग्रेस का हाथ छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया था।
सत्ता पलट के बाद हुए उपचुनाव में कांग्रेस खेत रही। बीजेपी ने कुल रिक्त हुईं 28 विधानसभा सीटों में से आधी से ज़्यादा जीतकर अपनी स्थिति मज़बूत कर ली है। उपचुनाव में हार का ठीकरा कमलनाथ के सिर फोड़े जाने का सिलसिला कांग्रेस पार्टी में इन दिनों तेज़ है।
सरकार जाने के बाद से कमलनाथ मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद के अपने पुराने दायित्व को अभी संभाल रहे हैं। राज्य में स्थानीय निकाय चुनावों की रणभेरी बजी हुई है।
तमाम राजनीतिक समीकरणों के बीच सीबीडीटी की रिपोर्ट को बस्ते से निकालकर चुनाव आयोग द्वारा लोकसभा चुनाव के दौरान हुई आईटी रेड को नये सिरे से हवा दिया जाना, कांग्रेस को और कमज़ोर बनाने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है।
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मध्य प्रदेश कांग्रेस के तरकश में अब दो ही ‘ब्रम्हास्त्र’ बचे हुए हैं। पहले कमलनाथ और दूसरे दिग्विजय सिंह। दिग्विजय सिंह मिस्टर बंटाधार वाले तमगे से 16-17 साल बाद भी नहीं उभर पाये हैं, लिहाज़ा चुनावी राजनीति में उनका उपयोग परदे के पीछे ही पार्टी करती है।
कमलनाथ विधानसभा चुनाव 2018 से बीजेपी से दो-दो हाथ कर रहे हैं। आर्थिक रूप से बेहद सक्षम हैं। अपने दम पर पीसीसी को पिछले दो-सवा दो सालों से चला रहे हैं। कमलनाथ का कमज़ोर होना सीधे तौर पर कांग्रेस का मध्य प्रदेश में अति कमज़ोर होना होगा।
यहाँ बता दें कि लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान आईटी की रेड हुई थी। रेड में कमलनाथ सरकार के सलाहकार राजेंद्र मिगलानी, रिश्तेदार रतुल पुरी की कंपनी मोजर बियर के लोगों, ओएसडी रहे प्रवीण कक्कड़, इंदौर के हवाला क़ारोबारी ललित कुमार छजलानी, कांट्रैक्टर अश्विनी शर्मा, प्रतीक जोशी व हिमांशु शर्मा निशाने पर रहे थे।
भोपाल सहित मध्य प्रदेश में कई शहरों और दिल्ली के 52 ठिकानों पर आयकर विभाग ने छापा मारा था। आयकर छापे में बड़ी मात्रा में लेन-देन के दस्तावेज़, 93 करोड़ के ट्रांजेक्शन और चार करोड़ रुपए की बरामदगी हुई थी।
कांग्रेस मुख्यालय भेजे गए 20 करोड़
छापे में कांग्रेस मुख्यालय को भी 20 करोड़ रुपए भेजने के दस्तावेज़ मिले थे। दस्तावेज़ों में प्रदेश के कई तत्कालीन मंत्रियों, विधायकों और लोकसभा उम्मीदवारों के साथ लेन-देन का भी उल्लेख था। इस बात के भी दस्तावेज़ मिले कि अफ़सरों के ज़रिए परिवहन, महिला एवं बाल विकास, खनिज, पीडब्ल्यूडी, नगरीय विकास जैसे विभागों में लेन-देन हुआ। सूत्रों के मुताबिक़ कुछ पुलिस अधिकारियों ने तो अपनी गाड़ी में पैसा का मूवमेंट किया।
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चीफ़ सेक्रेट्ररी के पास पहुँची रिपोर्ट
आयोग की रिपोर्ट मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव इक़बाल सिंह बैंस के पास पहुँच गई है। रिपोर्ट के मुताबिक़ आयोग ने सीबीडीटी के हवाले से कहा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान भारी मात्रा में अघोषित पैसे का ट्रांजेक्शन हुआ। तब राजनीतिक दल के नाम पर कुछ लोगों ने बड़ी रक़म एकत्र की। छापों में मिले दस्तावेज़ व सबूतों के आधार पर प्रथम-दृष्टया यह दिखता है कि राजनेताओं व कुछ अफ़सरों ने सिंडीकेट की तरह अवैध नगदी जुटाकर लेन-देन किया।
इन तीन अफ़सरों पर दर्ज होगा केस
तीन आईपीएस अफ़सरों सुशोभन बैनर्जी, संजय माने और बी. मधुकुमार पर सबसे पहले केस दर्ज होगा। राज्य पुलिस सेवा के अरुण मिश्रा पर भी केस दर्ज किये जाने के संकेत हैं।
मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव सुधि रंजन मोहंती की भूमिका पर भी सीबीडीटी रिपोर्ट में कई सवाल खड़े किये गये हैं। सूत्र कह रहे हैं कि ईओडब्ल्यू उनके ख़िलाफ़ भी प्रकरण दर्ज करेगा।
अफ़सरों के बाद पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके काबीना में सहयोगी (पूर्व मंत्री) भी लपेटे में आयेंगे। कमलनाथ के कई क़रीबी भी शिवराज सरकार के निशाने पर हैं। यानी मध्य प्रदेश के बहुतेरे कांग्रेसियों की मुश्किलें आने वाले दिनों में बढ़ेंगी।
प्रदेश सरकार के ईओडब्ल्यू में एफ़आईआर दर्ज करते ही केस में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की एंट्री भी स्वमेव हो जाएगी। यह मामला बड़े पैमाने पर नकदी के लेन-देन का है। संकेत हैं कि ईडी के साथ सीबीआई भी भ्रष्टाचार की जाँच करने के लिए सामने आएगी।
सूत्र बता रहे हैं कि पीडब्ल्यूडी, नगरीय विकास, सिंचाई, महिला एवं बाल विकास और परिवहन विभाग के अलावा शिवा कॉरपोरेशन, मोंटाना, डिजियाना, कार्निवल ग्रुप आदि मुश्किल में आने वाले हैं।
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