संयुक्त संसदीय समिति ने वक्फ विधेयक में एनडीए सांसदों द्वारा सुझाए गए सभी 14 संशोधन मान लिए और विपक्षी सांसदों द्वारा सुझाए गए सभी 44 संशोधन खारिज कर दिए। इसने जो संशोधन स्वीकार किए हैं उनमें से प्रमुख वह है जिसमें अनिवार्य दो गैर-मुस्लिम सदस्यों और मनोनीत पदेन सदस्यों के बीच अंतर बताया गया है। मनोनीत पदेन सदस्य मुस्लिम या गैर-मुस्लिम हो सकता है। मुस्लिम पक्ष वक्फ बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने का विरोध करते रहे हैं।
वक़्फ विधेयक पर काफी विवाद रहा है और इसको लेकर विपक्षी दल आपत्ति जताते रहे हैं। इस पर उनकी क्या आपत्ति रही है, यह जानने से पहले यह जान लें कि संयुक्त संसदीय कमेटी ने क्या ताज़ा फ़ैसला लिया है और किन संशोधनों को स्वीकार किया गया है। जेपीसी की बैठक के बाद सोमवार को समिति के अध्यक्ष जगदंबिका पाल ने कहा कि सोमवार को पारित संशोधनों के बाद एक बेहतर विधेयक बनेगा और गरीब और पसमांदा मुसलमानों को लाभ देने का सरकार का उद्देश्य पूरा होगा।
जेपीसी ने घोषणा की कि मसौदा रिपोर्ट 28 जनवरी तक प्रसारित की जाएगी और फिर 29 जनवरी को औपचारिक रूप से अपनाई जाएगी। विपक्षी सांसदों ने बैठक की कार्यवाही की आलोचना की और जगदंबिका पाल पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ख़त्म करने का आरोप लगाया। टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने संवाददाताओं से कहा, 'यह एक हास्यास्पद अभ्यास था। हमारी बात नहीं सुनी गई। पाल ने तानाशाही तरीके से काम किया है।' पाल ने आरोप को खारिज कर दिया और कहा कि पूरी प्रक्रिया लोकतांत्रिक थी और बहुमत के आधार फ़ैसला लिया गया।
समिति के अध्यक्ष ने कहा, 'खंड-दर-खंड विचार-विमर्श के लिए एक बैठक हुई थी। विपक्ष द्वारा पेश किए गए सभी संशोधनों में से प्रत्येक 44 को मैंने उनके नाम के साथ पढ़ा। मैंने उनसे पूछा कि क्या वे अपने संशोधन पेश कर रहे हैं। फिर उन्हें पेश किया गया। यह इससे अधिक लोकतांत्रिक नहीं हो सकता था। अगर संशोधन पेश किए गए और उनके ख़िलाफ़ 16 सदस्यों ने मतदान किया और उनके पक्ष में केवल 10 ने, तो क्या 10 सदस्यों के समर्थन वाले संशोधनों को स्वीकार किया जा सकता है? चाहे संसद हो या जेपीसी, यह स्वाभाविक है।' वक्फ पैनल में संसद के दोनों सदनों से 31 सदस्य हैं। इसमें से एनडीए से 16, जिसमें भाजपा से 12 शामिल हैं, विपक्षी दलों से 13, वाईएसआर कांग्रेस पार्टी से एक और एक नामित सदस्य।
क्या-क्या संशोधन स्वीकार्य
वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 पर जेपीसी द्वारा मंजूर 14 संशोधनों में से एक वक्फ बोर्ड में दो गैर-मुस्लिम सदस्यों की अनिवार्यता से जुड़ा है। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, यह बदलाव अनिवार्य दो गैर-मुस्लिम सदस्यों और नियुक्त पदेन सदस्य के बीच अंतर करता है। अनिवार्य दो गैर-मुस्लिम सदस्यों के बारे में बिल के शुरुआती मसौदे में बताया गया है। नियुक्त पदेन सदस्य मुस्लिम या गैर-मुस्लिम हो सकते हैं।
इसका मतलब यह है कि वक्फ परिषदों में चाहे वे राज्य स्तर पर हों या अखिल भारतीय स्तर पर, कम से कम दो सदस्य ऐसे होंगे जो गैर-मुस्लम होंगे। यदि नियुक्त पदेन सदस्य भी गैर-मुस्लिम हुआ तो ऐसे तीन सदस्य गैर-मुस्लिम हो जाएँगे।
रिपोर्ट के अनुसार एक अन्य अहम बदलाव में संबंधित राज्य द्वारा चुने गए एक अधिकारी को यह तय करने की जिम्मेदारी दी गई है कि कोई संपत्ति 'वक्फ' है या नहीं। पहले, यह निर्णय प्रारंभिक मसौदे के अनुसार जिला कलेक्टर के हाथों में था।
तीसरा बदलाव यह है कि यदि विचाराधीन संपत्ति पहले से पंजीकृत हो तो क़ानून लागू होने से पहले से यह प्रभावी नहीं होगा। हालाँकि, कांग्रेस नेता और जेपीसी सदस्य इमरान मसूद ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि लगभग 90 प्रतिशत वक्फ संपत्तियाँ वास्तव में पंजीकृत नहीं हैं। प्रस्तावित बदलावों के साथ-साथ 11 अतिरिक्त बदलावों का सुझाव सत्तारूढ़ बीजेपी के प्रतिनिधियों ने दिया था।
अतिरिक्त 11 संशोधनों में से तेजस्वी सूर्या द्वारा प्रस्तावित एक संशोधन में यह प्रावधान है कि भूमि दान करने का इरादा रखने वाले किसी भी व्यक्ति को कम से कम पांच वर्षों तक इस्लाम का पालन करने का प्रमाण देना होगा। इसके अलावा, उन्हें यह पुष्टि करनी होगी कि संपत्ति के समर्पण में कोई छल या हेरफेर शामिल नहीं है।
इस विधेयक को पिछले साल अगस्त में लोकसभा में पेश किया गया था। इसमें देश में मुस्लिम धर्मार्थ संपत्तियों के प्रबंधन के लिए 44 विवादास्पद संशोधनों का प्रस्ताव किया गया है। शुरुआत में इसे शीतकालीन सत्र में पेश किए जाने की संभावना थी, लेकिन विस्तृत जांच के लिए इसे जेपीसी को भेज दिया गया। हालाँकि जेपीसी की बैठकों में लगातार हंगामा होता रहा है और इस पर विवाद भी हुआ है। पिछले हफ़्ते ही यह समिति फिर विवादों में रही थी।
समिति के चेयरमैन जगदंबिका पाल ने 24 जनवरी को तब 10 विपक्षी सांसदों को एक दिन के लिए निलंबित कर दिया था जब बैठक में हंगामा हुआ था। आरोप लगा कि उसने जेपीसी बैठक का दिन बदलकर उसका एजेंडा भी बदल दिया था।
निलंबित सांसदों ने आरोप लगाया था कि बैठक में अघोषित इमरजेंसी जैसा माहौल रहता है। उन्होंने आरोप लगाया कि कमेटी के चेयरमैन ने किसी सदस्य की बात नहीं सुनी। टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी ने कहा था, 'जेपीसी बैठक एक अघोषित इमरजेंसी की तरह चलाई जा रही है। अध्यक्ष किसी की नहीं सुनते। कमेटी में सदस्य के तौर पर शामिल भाजपा सांसद सोचते हैं कि वे ही उप प्रधानमंत्री और उप गृहमंत्री हैं।' हालाँकि बीजेपी सांसदों व समिति के सदस्यों ने इन आरोपों को खारिज कर दिया था।
जेडीयू और टीडीपी का क्या रुख रहेगा?
एनडीए के सहयोगी नीतीश कुमार का जेडीयू और चंद्रबाबू नायडू की डीटीपी इस विधेयक के कुछ प्रावधानों को लेकर आपत्ति जताते रहे थे। पिछले साल ऐसी ख़बरें आई थीं कि जेडीयू मुस्लिम समुदाय के हितों की बेहतर सुरक्षा के लिए प्रस्तावित कानून में बदलाव पर जोर दे रही थी। जेडीयू का कहना है कि मुस्लिम समुदाय की ही सलाह पर विधेयक में बदलाव होना चाहिए। बिहार में अगले साल विधानसभा चुनाव है। राज्य में मुस्लिम आबादी 18 फीसदी है। जेडीयू को यह गणित अच्छी तरह मालूम है। हालांकि पार्टी ने उससे पहले विधेयक का समर्थन किया था और उस विधेयक का समर्थन किया था। उन्होंने पारदर्शिता बढ़ाने के लिए संशोधनों को जरूरी बताया था। ख़बरों में कहा गया था कि फिर जेडीयू के भीतर असंतोष उभर आया क्योंकि बिहार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री मोहम्मद ज़मा खान ने मुख्यमंत्री से मिलकर कुछ प्रावधानों के बारे में चिंता व्यक्त जताई थी।
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इस बीच ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष खालिद सैफुल्लाह रहमानी ने कहा था कि उन्होंने एनडीए के सहयोगी चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार से मुलाकात की और दोनों नेताओं ने वक्फ विधेयक पर अपना विरोध जताया।
फतुल्लाह मोहम्मद ने कहा था, 'हम टीडीपी में विधेयक में संशोधन का स्वागत करते हैं। हम इसके खिलाफ नहीं हैं, लेकिन हमें लगता है कि बदलावों के माध्यम से वक्फ बोर्ड को मजबूत किया जाना चाहिए, न कि इसके विपरीत। ...मैंने इस मुद्दे को अपने सांसदों और पार्टी नेतृत्व के समक्ष उठाया और जमात-ए-इस्लामी हिंद के सचिव एम अब्दुर रफीक, सहायक सचिव इनामुर रहमान और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हसीबुर रहमान के साथ मिलकर अपनी चिंताओं पर चर्चा की। हमारे सांसदों ने सीएम से संपर्क किया जिन्होंने उन्हें विधेयक को संयुक्त समिति को भेजने की सलाह दी।' हालाँकि, अब जेपीसी द्वारा 14 संशोधनों को स्वीकार किए जाने के बाद जेडीयू और टीडीपी की ओर से अभी तक बयान नहीं आया है।
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