क्या आपको पता है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब अप्रैल 1971 में थल सेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ को बुला कर बांग्लादेश की आज़ादी के लिए सेना भेजने और पूर्वी पाकिस्तान पर चढ़ाई करने को कहा था तो उन्होंने क्या कहा था? जनरल मानकशॉ ने साफ़ इनकार कर दिया था।
ऐसे समय जब सेना के वरिष्ठतम अफ़सरों में सत्तारूढ़ दल की नीतियों और सिद्धान्तों की हां में हां मिला कर अपने निजी स्वार्थ साधने की होड़ लग गई हो, जनरल मानेकशॉ का उदाहरण कई सवाल खड़े करता है।
चंद्रशेखर दासगुप्ता ने अपनी किताब 'इंडिया एंड द बांग्लादेश लिबरेशन वॉर' में लिखा है कि इंदिरा गांधी ने 28 या 29 अप्रैल 1971 को पूर्वी बंगाल की स्थिति पर चर्चा करने के लिए कैबिनेट की बैठक बुलाई। उन्होंने जान बूझ कर पूर्वी पाकिस्तान नहीं कह कर 'पूर्वी बंगाल' कहा, जिससे यह पता चलता है कि वे अपने सलाहकारों और सहायकों से आगे सोचती थीं।
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कैबिनेट की बैठक
उस बैठक में तत्कालीन विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह, रक्षा मंत्री जगजीवन राम, इंदिरा गांधी के सचिव पी. एन. हक्सर व दूसरे लोग थे।
इंदिरा गांधी पर किताब लिखने वाली पुपुल जयकर के अनुसार प्रधानमंत्री ने पूर्वी बंगाल से आ रहे शरणार्थियों पर चिंता जताई। उन्होंने जनरल से कहा, "पूर्वी बंगाल में पाकिस्तानी सेना बड़ी कार्रवाई कर रही है और बड़ी संख्या में शरणार्थी वहाँ से भाग कर आ रहे हैं। आपको इसे रोकना होगा। ज़रूरत पड़े तो आप पूर्वी पाकिस्तान जाइए, पर इसे रोकिए।"
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'हार तय है'
जनरल मानेकशॉ ने इस पर कहा, "यदि अभी हमें वहाँ हस्तक्षेप के लिए जाना पड़ा तो सौ फ़ीसदी हमारी हार होगी।"
दासगुप्ता जनरल से निजी बातचीत के आधार पर किताब में लिखते हैं कि किस तरह सेना प्रमुख ने उस समय भारतीय सेना को कूच करने से कहने से रोका।
जनरल ने इंदिरा गांधी को समझाया कि सेना अभी युद्ध के लिए तैयार नहीं है और उसे कूच करने से पहले तैयारी करनी होगी जिसके लिए समय चाहिए।
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क्या कहा था जनरल मानेकशॉ ने?
फ़ील्ड मार्शल जनरल मानेकशॉ ने अक्टूबर,1995 में दिल्ली में के. एम. करिअप्पा मेमोरियल लेक्चर देते हुए पूरी जानकारी खुद दी थी। उन्होंने कहा,
"नौकरी से निकाले जाने और फ़ील्ड मार्शल बनाए जाने में बहुत ही महीन फर्क होता है। 1971 में पाकिस्तानी सेना पूर्वी पाकिस्तान में बड़े पैमाने पर कार्रवाई कर रही थी और लाखों की तादाद में शरणार्थी पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा में दाखिल हो रहे थे। प्रधानमंत्री ने कैबिनेट की बैठक की और उसके बाद मुझे बुलाया।"
बहुत ही दुख और गुस्से के साथ प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा के मुख्यमंत्रियों के भेजे टेलीग्राम पढ़ कर सुनाए। वे मेरी ओर मुड़ी और मुझसे सीधे पूछा, "और आप क्या कर रहे हैं?"
मैंने जवाब दिया, कुछ नहीं। मेरे लिए करने को कुछ नहीं है। आपने उस समय मुझसे नहीं पूछा जब आपने बीएसएफ़, सीआरपी और रॉ को पाकिस्तान के ख़िलाफ़ लोगों को भड़काने के लिए कहा था। अब जब आप मुसीबत में हैं तो मेरे पास आई हैं। मेरी नाक लंबी है और मुझे पता है कि क्या चल रहा है।
उन्होंने कहा, मैं चाहती हूँ कि आप पाकिस्तान जाएं।
मैंने कहा, इसका मतलब यह कि युद्ध हो।
उन्होंने कहा, यदि युद्ध भी होता है तो मुझे बुरा नहीं लगेगा।
मैंने उनसे पूछा, क्या आप युद्ध के लिए तैयार हैं, मैं तो बिल्कुल नहीं हूँ। यह अप्रैल है, हिमालय के दर्रे खुलने वाले हैं और चीन से हमला हो सकता है।
जनरल मानेकशॉ ने कहा, 'इसके बाद मैं प्रधानमंत्री की ओर मुड़ा और कहा, मानसून शुरू होने वाला है, वहाँ जब बारिश होती है तो मूसलाधार बारिश होती है, बाढ़ आती है। बर्फ पिघलने वाला है, नदियाँ महासागर बन जाएंगी। हम सिर्फ सड़क का ही इस्तेमाल कर पाएंगे।'
इसके बाद मानेकशॉ ने इंदिरा गांधी को समझाया कि वायु सेना खराब मौसम के कारण बहुत अधिक मदद नहीं कर पाएगी।
फिर उन्होंने कहा, 'प्रधानमंत्री जी, अब आप हमें आदेश दीजिए।'
लेकिन वह चुप रहीं, उन्होंने मुट्ठियाँ भींच लीं।
जब मानेकशॉ जाने लगे तो इंदिरा गांधी ने कहा, 'जनरल क्या आप रुक नहीं सकते।'
जनरल ने कहा, 'प्रधानमंत्री जी, आप अपना मुँह खोलें, क्या इससे पहले मैं शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य के आधार पर अपना इस्तीफ़ा भेज दूँ?'
इंदिरा गांधी ने कहा, 'आप जो कुछ कह रहे हैं, वह सच है।'
मानेकशॉ ने कहा, 'हाँ। सच बताना मेरा काम है, युद्ध करना मेरा काम है और जीतने के लिए युद्ध करना मेरा काम है। मुझे आपसे सच कहना ही चाहिए।?'
वे मुस्कराई और उन्होंने कहा, 'ठीक है सैम। आप समझ रहे हैं न कि मैं क्या चाहती हूं?'
जनरल ने कहा, 'हाँ मैं समझ रहा हूं कि आप क्या चाहती हैं।'
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क्या थी योजना?
श्रीनाथ राघवन 'अ ग्लोबल हिस्ट्री ऑफ़ क्रिएशन ऑफ़ बांग्लादेश' में लिखते हैं कि मार्च 1971 तक यह निर्णय ले लिया गया था कि पूर्वी पाकिस्तान पर हमला कर दिया जाए, लेकिन इसके साथ यह भी सोचा जा रहा था कि उसके लिए समय अनुकूल नहीं है। इस समय सेना भेजने से विश्व समुदाय भारत के बजाय पाकिस्तान के साथ सहानुभूति दिखाएगा। लिहाज़ा, यह तय किया गया कि पहले पूर्वी पाकिस्तान में चल रहे नरसंहार की ओर दुनिया का ध्यान खींचा जाए और ऐसा माहौल बनाया जाए जिसमें भारतीय सेना की कार्रवाई को उचित ठहराया जा सके। इसमें कम से कम छह महीने लग सकते हैं।
लेकिन यह तो साफ है कि जनरल मानेकशॉ ने प्रधानमंत्री के हमले के आदेश को तुरन्त नहीं माना था।
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