क्या वोटर आईडी से आधार को जोड़ना इतना आसान है? ख़ासकर तब जब 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने आधार के इस्तेमाल को कल्याणकारी योजनाओं और पैन लिंकिंग तक सीमित कर दिया था। क्या स्वैच्छिक बताकर इसे आधार से जोड़ा जा सकता है? एक सवाल यह भी है कि जब वोटर के आधार नंबर देना स्वैच्छिक है तो तरह-तरह के नियम लगाने की कोशिश क्यों हो रही है? 'मेरे पास आधार नंबर नहीं है, इसलिए मैं इसे देने में असमर्थ हूं' वाले वोटर के डेक्लेयरेशन पर जब आपत्ति उठी तो अब निर्वाचन अधिकारी के सामने पेश होकर वजह बताने के प्रस्ताव की तैयारी क्यों? आधार नंबर नहीं देना, ये कैसी स्वैच्छिकता है? आइए, पूरे इस मामले को समझते हैं।
दरअसल, चुनाव आयोग ने एक नया प्रस्ताव सामने रखा है, जिसके तहत यदि कोई मतदाता अपने आधार नंबर को साझा करने से इनकार करता है, तो उसे व्यक्तिगत रूप से निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी यानी ईआरओ के सामने उपस्थित होकर इसकी वजह बतानी पड़ सकती है। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार प्रस्ताव चुनाव आयोग के उस दावे को मज़बूत करने के लिए लाया जा रहा है, जिसमें उसने अदालत में कहा था कि आधार नंबर देना पूरी तरह से स्वैच्छिक है।
ईआरओ आमतौर पर एक सिविल सेवा या राजस्व अधिकारी होता है। इसको 1950 के जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 13बी के तहत विधानसभा क्षेत्रों के लिए मतदाता सूची तैयार करने, अपडेट करने और संशोधित करने का अधिकार है।
यह प्रस्ताव पिछले सप्ताह 18 मार्च को हुई एक उच्च-स्तरीय बैठक में चर्चा का विषय बना, जिसमें गृह मंत्रालय, विधि मंत्रालय, सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और यूआईडीएआई के प्रतिनिधियों के साथ-साथ चुनाव आयोग के वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। इस बैठक में फॉर्म 6बी में संशोधन की संभावना पर विचार किया गया, जिसके ज़रिए आधार नंबर जुटाने की प्रक्रिया को और साफ़ करने की कोशिश की जा रही है।
फ़िलहाल, फॉर्म 6बी में मतदाताओं के लिए आधार नंबर देने या न देने के सीमित विकल्प हैं। यह फॉर्म दो विकल्प देता है: या तो आधार नंबर दें, या यह घोषणा करें कि 'मेरे पास आधार नंबर नहीं है, इसलिए मैं इसे देने में असमर्थ हूं।'
सितंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट में जी निरंजन बनाम भारत चुनाव आयोग मामले में याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि यह दूसरा विकल्प मतदाताओं को ग़लत बयान देने के लिए मजबूर करता है, खासकर तब जब वे स्वेच्छा से आधार साझा नहीं करना चाहते।
नए प्रस्ताव के तहत फॉर्म 6बी से यह दूसरा विकल्प हटाया जाएगा। अब मतदाता केवल यह घोषणा कर सकेंगे कि वे आधार के बजाय वैकल्पिक दस्तावेज दे रहे हैं और निर्धारित तारीख पर ईआरओ के सामने उपस्थित होंगे ताकि यह साफ़ कर सकें कि वे आधार नंबर क्यों नहीं दे रहे। इस बदलाव का मक़सद यह सुनिश्चित करना है कि आधार देना पूरी तरह स्वैच्छिक रहे, जैसा कि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में वादा किया था।
इस संशोधन को लागू करने के लिए विधि मंत्रालय को गजट अधिसूचना जारी करनी होगी, लेकिन यह तभी संभव होगा जब चुनाव आयोग केंद्र सरकार को औपचारिक प्रस्ताव भेजेगा। माना जा रहा है कि यह बदलाव बिहार में अगले विधानसभा चुनाव से पहले लागू हो सकता है।
चुनाव आयोग के सामने चुनौती
यूआईडीएआई के साथ मिलकर मतदाता पहचान पत्र को आधार नंबर से जोड़ने को लागू करने की योजना है। यह प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत होगी, जो मतदाता पहचान सत्यापन के लिए आधार मांगने का अधिकार देती है। कहा जा रहा है कि इसके साथ ही, इसका प्रावधान भी है कि आधार न देने पर किसी को मतदाता सूची से नहीं हटाया जाएगा।
लेकिन इसकी राह आसान नहीं है। 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने आधार के इस्तेमाल को कल्याणकारी योजनाओं और पैन लिंकिंग तक सीमित कर दिया था। इसके बाद ईसीआई को अपना नेशनल इलेक्टोरल रोल प्यूरीफिकेशन एंड ऑथेंटिकेशन प्रोग्राम यानी एनईआरपीएपी को रोकना पड़ा था। इस दौरान आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में क़रीब 30 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हट गए थे, जिसे लेकर कोर्ट में चुनौती दी गई। 2021 में चुनाव कानून (संशोधन) अधिनियम पारित होने के बाद आधार लिंकिंग को फिर से मंजूरी मिली, लेकिन विपक्ष और विशेषज्ञ इसे गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन मानते हैं। सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में कहा गया कि यह मतदान के मौलिक अधिकार को प्रभावित कर सकता है, खासकर अगर कोई आधार न होने के कारण वोट से वंचित हो।
बहरहाल, यह ताज़ा प्रस्ताव उस समय चर्चा में आया है जब विपक्षी दलों का गठबंधन 'इंडिया' विभिन्न राज्यों में मतदाता सूचियों में अनियमितताओं का आरोप लगा रहा है।
इस प्रस्ताव से चुनाव आयोग की मंशा तो साफ़ हो सकती है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में कई चुनौतियाँ हैं। पहला, अगर 32 करोड़ मतदाताओं में से एक बड़ा हिस्सा आधार नंबर देने से इनकार करता है तो क्या ईआरओ के पास इतने लोगों से व्यक्तिगत रूप से मिलने की क्षमता होगी? दूसरा, यह प्रक्रिया मतदाताओं के लिए बोझिल हो सकती है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां ईआरओ कार्यालय तक पहुंच आसान नहीं है। तीसरा, विपक्ष इसे अप्रत्यक्ष रूप से आधार को अनिवार्य बनाने की कोशिश के रूप में देख सकता है, जिससे राजनीतिक विवाद और बढ़ सकता है।
चुनाव आयोग का यह कदम आधार को स्वैच्छिक रखने की उसकी प्रतिबद्धता को दोहराता है, लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी उठता है कि क्या यह प्रक्रिया वास्तव में मतदाताओं की सुविधा और निष्पक्षता को बढ़ाएगी या इसे और जटिल बनाएगी।
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