“बनारस हिंदू विश्वविद्यालय जाति के आधार पर भेदभाव करता है।“ यह आरोप है एक दलित छात्र शिवम सोनकर का, जो पिछले 14 दिनों से कुलपति के निवास के बाहर धरने पर बैठे हैं। उनकी माँग साफ है, उन्हें पीएचडी में प्रवेश दिया जाए। यह माँग सिर्फ एक सीट की नहीं, बल्कि उस भेदभाव के खिलाफ है, जो उनकी नज़र में विश्वविद्यालय की नीतियों में गहरे तक समाया हुआ है। शिवम की यह कहानी बीएचयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में जातिगत आधार पर होने वाली कथित नाइंसाफी को भी सामने लाती है।
शिवम सोनकर की लड़ाई पीएचडी में दाखिला लेने को लेकर शुरू हुई थी। उन्होंने पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट स्टडीज विभाग में रिसर्च एंट्रेंस टेस्ट यानी आरईटी (RET) के तहत अप्लाई किया था। उन्होंने अपना आवेदन नॉन-जूनियर रिसर्च फेलोशिप यानी नॉन-JRF श्रेणी के लिए दिया था। परीक्षा में शिवम ने दूसरा स्थान हासिल किया। यह नतीजा उनकी मेहनत और काबिलियत का सबूत था। इसके बावजूद उन्हें प्रवेश से वंचित कर दिया गया। विभाग में कुल सात सीटें थीं। इनमें से चार सीटें जूनियर रिसर्च फेलोशिप यानी JRF के लिए थीं, जबकि तीन सीटें नॉन-जेआरएफ़ के लिए रखी गई थीं।
परेशानी तब शुरू हुई, जब पता चला कि आरईटी के तहत अनुसूचित जाति यानी एससी वर्ग के लिए कोई भी सीट आरक्षित नहीं थी। नतीजा यह हुआ कि तीनों नॉन-जेआरएफ़ सीटें सामान्य और ओबीसी वर्ग के छात्रों को दे दी गईं। शिवम के पीएचडी के सपनों पर पानी फिर गया। उनका कहना है कि अगर आरक्षण का प्रावधान होता तो उन्हें मौका मिल सकता था।
शिवम का दावा है कि बनारास हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रशासन के पास जेआरएफ़ की खाली सीटों को अन्य श्रेणियों में बदलने की शक्ति है। यूनिवर्सिटी ने शिवम की इन मांगों पहले पहल खारिज कर दिया। गौरतलब है कि इस परीक्षा का परिणाम 20 मार्च को घोषित हुआ। शिवम 21 मार्च से लगातार धरने पर बैठे हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि वे पिछले 14 दिनों से वहीं बैठे हैं।
शिवम का मामला अभी चल ही रहा था कि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय पर जातिवाद एक और आरोप लगा। यह आरोप विश्वविद्यालय के प्रोफेसर महेश प्रसाद अहिरवार ने लगाया है।
गौरतलब है कि यह पहला मौका नहीं है जब बीएचयू पर भेदभाव का आरोप लगा है। बीएचयू के पत्रकारिता और जनसंचार विभाग के चेयरपर्सन का पदभार संभालने वाली डॉ. शोभना नर्लिकर को भी सालों संघर्ष करना पड़ा। वे इस पद पर आरूढ़ होने वाली देश की पहली दलित महिला हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय पर आरोप लगाया था कि 2017 से उनके प्रमोशन को रोका जा रहा था। हर बार जब उनके प्रमोशन के लिए साक्षात्कार तय होता, उसे अंतिम क्षण में रद्द कर दिया जाता। उन्होंने सभी योग्यताओं को पूरा करने के बावजूद प्रोफेसर का पद नहीं प्राप्त किया, जबकि उनके जूनियर और कम योग्यता वाले शिक्षकों को पदोन्नति दी गई। अंततः जब विश्वविद्यालय प्रशासन के पास कोई और विकल्प नहीं बचा, तब उन्हें विभागाध्यक्ष बनाया गया। इस पद को पाने के लिए उन्हें हफ्तों तक अकेले धरने पर बैठना पड़ा था।
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में जातिवाद की यह विकट कहानी कई प्रश्न खड़े करती है। एक सवाल यह भी कि क्या दलितों का हिन्दू की पूरी वर्ण व्यवस्था में कोई स्थान नहीं?
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