तीसरी तिमाही की जीडीपी विकास दर ने फिर से निराश किया है। शुक्रवार को जारी आँकड़ों के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था 2024-25 की तीसरी तिमाही में 6.2 प्रतिशत की दर से बढ़ी। यह उम्मीद के अनुसार नहीं है। एक साल पहले इसी अवधि में यह दर 9.5 फ़ीसदी रही थी। तो क्या यह अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं? यदि स्थिति अच्छी है तो निर्माण क्षेत्र का प्रदर्शन ख़राब क्यों है, विदेशी निवेशक भाग क्यों रहे हैं, शेयर बाज़ार धड़ाम क्यों गिर रहा है और कंपनियों का उत्पादन गिर क्यों रहा है?
इन सवालों का जवाब जानने से पहले जीडीपी की स्थिति को समझ लें। अक्टूबर-दिसंबर में जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर के आँकड़े उम्मीद के अनुसार इसलिए भी नहीं हैं क्योंकि केंद्रीय बैंक ने इसके 6.8% रहने का अनुमान लगाया था। आर्थिक विश्लेषक भी ज़्यादा की उम्मीद लगाए बैठे थे। रॉयटर्स पोल में विश्लेषकों ने इसके 6.3% रहने का अनुमान लगाया था। हालाँकि, थोड़ी राहत की ख़बर यह है कि मौजूदा विकास दर पिछली तिमाही से कुछ बेहतर है। पिछली तिमाही में यह दर 5.8% रही थी।
दूसरी तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की जीडीपी विकार दर पहले अनुमानित 5.4 प्रतिशत थी लेकिन दूसरी तिमाही के लिए वास्तविक जीडीपी विकास दर को संशोधित कर 5.6% कर दिया गया है।
एनएसओ के आँकड़ों से पता चलता है कि दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार 2024-25 के पूरे वर्ष के लिए देश की अर्थव्यवस्था 6.5 प्रतिशत की गति से बढ़ रही है। पिछले महीने चालू वित्त वर्ष के दौरान 6.4 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया गया था।
अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में ऐसे नतीजे क्यों?
अक्टूबर और दिसंबर के बीच जीडीपी वृद्धि को बढ़ाने में ग्रामीण मांग एक प्रमुख फ़ैक्टर रही। अनुकूल मानसून से कृषि उत्पादन में सुधार हुआ। इससे प्रमुख ख़रीफ़ फ़सलों का उत्पादन बढ़ा और ग्रामीण आय में वृद्धि हुई। वित्त वर्ष 25 की तीसरी तिमाही में कृषि विकास दर बढ़कर 4.5% होने का अनुमान है। यह पिछले वर्ष की इसी तिमाही में केवल 0.4% से तेज वृद्धि है। तिसरी तिमाही में विनिर्माण और खनन क्षेत्रों में कमजोर प्रदर्शन के कारण जीडीपी विकास दर उम्मीद के अनुसार नहीं रही।
निवेश कम क्यों हो रहा है?
जीडीपी देश की अर्थव्यवस्था की रफ़्तार को बताता है और रफ़्तार बढ़ाने में निवेश का बड़ा हाथ होता है। लेकिन दिक्कत यह है कि निवेशक किसी अर्थव्यवस्था में निवेश तभी करते हैं जब उन्हें फायदा नज़र आता है। तो सवाल है कि देश में निवेश की स्थिति क्या है?
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रिपोर्टें हैं कि सितंबर महीने में बाजार के शिखर पर पहुँचने के बाद से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक यानी एफ़पीआई ने 2.14 लाख करोड़ रुपये की निकासी की है। यह तब हुआ जब शेयर बाज़ार में उच्च मूल्यांकन और अर्थव्यवस्था के धीमा होने की चिंताएँ हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय शेयर बाजार में एफ़पीआई लगातार पैसे निकाल रहे हैं।
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शेयर बाज़ार में यह गिरावट अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ की धमकियों और भारत में तीसरी तिमाही के जीडीपी के आँकड़े जारी होने की संभावना के बीच आई। इस बीच अन्य एशियाई शेयर बाज़ारों में भी कमजोरी रही। हालाँकि, इसके अलावा भी कई और कारण हैं जिनकी वजह से बाज़ार धड़ाम गिरा है। इनमें भारतीय बैंकों की आय में कमी होना, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और एफ़आईआई का भारत से चीन की ओर जाना शामिल हैं।
कंपनियों का प्रदर्शन भी ठीक नहीं
वैसे, कंपनियों का प्रदर्शन भी कुछ ठीक नहीं रहा है। हाल में ख़बरें आई थीं कि देश की सबसे बड़ी पेंट कंपनी और शेयर बाजार का सुरक्षित निवेश मानी जानेवाली एशियन पेंट्स ने अपनी बिक्री में दस प्रतिशत से ज्यादा गिरावट दर्ज की है। ऐसा कंपनी के इतिहास में लंबे समय बाद हुआ है। सबसे बड़ी कंज्यूमर कंपनी हिंदुस्तान यूनिलिवर की बिक्री दो साल से स्थिर है। यही हाल नेस्ले, मैरिको और डाबर जैसी बड़ी कंपनियों के है। उनकी बिक्री या तो स्थिर है या फिर घट रही है। यानी अर्थव्यवस्था में मांग कम हो रही है। यह जगजाहिर है कि अर्थव्यवस्था मांग और ख़पत पर ही चलती है।
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