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SC जज करेंगे अपनी संपत्ति की घोषणा; कितनी पारदर्शिता आ पाएगी?

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका में पारदर्शिता और जनता के भरोसे को मज़बूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक क़दम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों ने अपनी संपत्ति की घोषणा को सार्वजनिक करने पर सहमति जताई है। यह निर्णय 1 अप्रैल को आयोजित एक फुल-कोर्ट मीटिंग में लिया गया, जिसमें जजों ने अपनी संपत्ति की जानकारी भारत के मुख्य न्यायाधीश को सौंपने और इसे सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड करने का फैसला किया। यह जानकारी लाइव लॉ के सूत्रों ने दी।

हालाँकि, फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के सभी जज अपनी संपत्ति की घोषणा जमा कर चुके हैं, लेकिन अब तक ये घोषणाएं सार्वजनिक नहीं की गई थीं। इस नए फ़ैसले के बाद यह स्थिति बदलने वाली है। यह क़दम उस विवाद के बाद आया है जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट के जज के रूप में कार्यरत जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक परिसर में नकदी मिलने की कथित ख़बरें सामने आई थीं। इसके साथ ही नेशनल ज्यूडिशियल अप्वाइंटमेंट कमिशन यानी एनजेएसी की मांग पर चर्चा ने जोर पकड़ लिया। इस घटना ने न्यायपालिका में जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े किए थे।

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भारत में जजों की संपत्ति को सार्वजनिक करने की मांग समय-समय पर विभिन्न राजनेताओं और एक्टिविस्टों द्वारा उठाई गई है। यह मुद्दा न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाने के संदर्भ में चर्चा का विषय रहा है। 

बीजेपी सांसद रहे सुशील कुमार मोदी ने इस मुद्दे को संसद में उठाया था। दिसंबर 2023 में राज्यसभा में उन्होंने कहा था कि जिस तरह सांसद, विधायक, आईएएस, आईपीएस और अन्य अधिकारी अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक करते हैं, उसी तरह जजों की संपत्ति भी सार्वजनिक होनी चाहिए। उनका तर्क था कि इससे न्यायपालिका में पारदर्शिता बढ़ेगी और जनता का भरोसा मजबूत होगा। यह मांग उन्होंने न्यायिक सुधारों के व्यापक संदर्भ में रखी थी।

जब जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली हाई कोर्ट में कार्यकाल के दौरान नकदी से जुड़ा विवाद सामने आया तो विपक्षी नेताओं ने इस तरह के मामलों में संपत्ति घोषणा की ज़रूरत पर जोर दिया।
वरिष्ठ वकील और एक्टिविस्ट इंदिरा जयसिंह ने लंबे समय से न्यायपालिका में पारदर्शिता की वकालत की है। उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत जजों की संपत्ति को सार्वजनिक करने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि जब तक जजों की संपत्ति की जानकारी सार्वजनिक नहीं होगी, तब तक न्यायिक प्रणाली में भ्रष्टाचार के आरोपों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो सकता। बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि आरटीआई के तहत जजों की संपत्ति की जानकारी देने से इनकार करना पारदर्शिता के ख़िलाफ़ है।
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जाने-माने वकील और एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण ने भी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है। वे न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चलाने के लिए जाने जाते हैं। कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स लंबे समय से न्यायपालिका में सुधारों की मांग कर रहा है। 

बहरहाल, माना जाता है कि न्यायपालिका पर जनता का भरोसा लोकतंत्र का एक अहम आधार है। जजों की संपत्ति को सार्वजनिक करने का यह निर्णय न केवल जवाबदेही को बढ़ावा देगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करेगा कि न्यायिक प्रणाली में कोई संदेह की गुंजाइश न रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह क़दम निचली अदालतों के लिए भी एक मिसाल कायम कर सकता है, जहां अभी तक ऐसी पारदर्शिता की कमी देखी जाती है।

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हालाँकि, संपत्ति घोषणाओं को प्रकाशित करने की प्रक्रिया अभी तय की जानी बाक़ी है। इसमें यह अहम होगा कि क्या यह जानकारी पूरी तरह सार्वजनिक होगी या इसमें कुछ गोपनीयता के पहलू शामिल किए जाएंगे। इसके अलावा, इस क़दम का असर जजों की स्वतंत्रता और उनकी निजता पर भी पड़ सकता है, जिस पर बहस छिड़ सकती है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फ़ैसला निस्संदेह एक स्वागत योग्य कदम है, जो न्यायिक प्रणाली में विश्वास को और मज़बूत करने की दिशा में काम करेगा। यह क़दम न केवल पारदर्शिता को बढ़ावा देगा, बल्कि यह भी संदेश देगा कि क़ानून के रखवाले खुद को जवाबदेह मानते हैं। आने वाले दिनों में इसकी प्रक्रिया और प्रभाव को लेकर और स्पष्टता की उम्मीद की जा रही है। एक सवाल यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट जजों ने तो संपत्ति सार्वजनिक करने की घोषणा कर दी, लेकिन हाईकोर्ट जजों और निचली अदालतों के जजों का क्या होगा? इसके साथ ही जजों के रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले लाभ को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। कहा जाता है कि जब तक इस पर कुछ ठोस प्रयास नहीं किए जाते हैं तब तक पारदर्शिता को लेकर संदेह पूरी तरह दूर नहीं होंगे।

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क़मर वहीद नक़वी
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