बीएसएनएल की लापरवाही की हद
कमाल की बात यह है कि बीएसएनएल की लापरवाही सिर्फ जियो तक सीमित नहीं रही। कंपनी ने जियो के अलावा कई अन्य टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोवाइडर्स के साथ भी रेवन्यू शेयरिंग के करार किए थे। इन करारों के तहत बीएसएनएल को लाइसेंस फीस वसूलनी थी, जो सरकार के खजाने में जमा होती। मगर बीएसएनएल इतनी ढीली निकली कि ये फीस वसूलना ही भूल गई। इस गलती की कीमत सरकार को 38 करोड़ 36 लाख रुपये के अतिरिक्त नुकसान के रूप में चुकानी पड़ी। अगर इन दोनों नुकसानों - बिल न भेजने और लाइसेंस फीस न वसूलने - को जोड़ दिया जाए, तो कुल मिलाकर सरकार को करीब 1800 करोड़ रुपये का चूना लगा। यह रकम कोई छोटी-मोटी नहीं है, खासकर तब जब बीएसएनएल सरकारी पैसे से चलने वाली संस्था है।बीएसएनएल का इतिहास वित्तीय संकटों से भरा रहा है। 2013-14 में कंपनी को 14,979 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था, और तब से यह लगातार सरकारी मदद पर निर्भर रही है। लेकिन इस बार का खुलासा सिर्फ पैसे के नुकसान की कहानी नहीं कहता, बल्कि बीएसएनएल के मैनेजमेंट की गहरी खामियों को भी उजागर करता है।
मई 2014 में बीएसएनएल और रिलायंस जियो के बीच एक समझौता हुआ था, जिसमें बीएसएनएल के निष्क्रिय पड़े टावर और फाइबर नेटवर्क जैसे संसाधनों को जियो के साथ साझा करना तय हुआ। बदले में जियो को बीएसएनएल को भुगतान करना था। लेकिन बीएसएनएल ने तय समय पर बिल भेजने की जहमत तक नहीं उठाई। दस साल बीत गए, और यह लापरवाही अब जाकर सामने आई।"
और भी नुकसान हुए हैंः इस सरकारी टेलिकॉम एजेंसी की नुकसान की यह फेहरिस्त यहीं खत्म नहीं होती। बीएसएनएल की लापरवाही के कई और पहलू हैं, जो सीएजी रिपोर्ट में उभरकर आए। मिसाल के तौर पर, खराब मैनेजमेंट और भूमिगत केबलों की गलत खरीद में कंपनी ने 80.64 करोड़ रुपये बर्बाद कर दिए। इसके अलावा, डक्ट हायरिंग चार्ज के बिलों को समय पर वेरिफाई न करने की वजह से बीएसएनएल जीएसटी इनपुट टैक्स क्रेडिट का दावा नहीं कर पाई, जिससे 5.5 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
प्रोजेक्ट्स को ठीक से न निभाने और कॉन्ट्रैक्ट्स में ढील बरतने के कारण 4 करोड़ 80 लाख रुपये हाथ से निकल गए। इतना ही नहीं, लापरवाही की वजह से 2 करोड़ 31 लाख रुपये का ब्याज भी डूब गया। ये छोटे-छोटे नुकसान भले ही अलग-अलग दिखें, लेकिन इन्हें जोड़ने पर यह रकम करोड़ों में पहुंच जाती है।
अपनी राय बतायें