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वक्फ कानून से बीजेपी को क्या मिलाः बढ़ती ताकत, बिखरते सहयोगी क्षेत्रीय दल

संसद के हालिया बजट सत्र ने बीजेपी की राजनीतिक ताकत को मजबूत किया है। वक्फ संशोधन विधेयक, 2024 के पारित होने के साथ ही यह स्पष्ट हो गया है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगी दल बीजेपी के नेतृत्व में पूरी तरह से एकजुट हो गए हैं। उनकी अपनी सोच और आजादी का अब कोई महत्व नहीं रहा। इस विधेयक को लोकसभा में 288 सांसदों के समर्थन और 232 के विरोध में पारित किया गया, जबकि राज्यसभा में इसे 128 मतों के पक्ष और 95 मतों के विरोध में मंजूरी मिली। इन आंकड़ों से साफ है कि बीजेपी के सहयोगी अब उसके साथ खड़े हैं, जिससे बीजेपी की राजनीतिक प्रभुत्व की स्थिति फिर से मजबूत होती दिख रही है। अब वो और कड़े फैसले लेने की स्थिति में है।

हैरानी की बात है कि दो पार्टियां, बीजू जनता दल (बीजेडी)और वाईएसआर कांग्रेस जो बीजेपी के विरोध में खुद को दिखा रही थीं, ने अपने सांसदों को राज्यसभा में इस विधेयक पर मतदान के लिए कोई व्हिप ही जारी नहीं किया। इन दोनों दलों को अपने-अपने राज्यों में बीजेपी की वजह से झटका लगा है। इसके बावजूद दोनों दल बीजेपी के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाए। यह अजीब बात है या नहीं। 
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यह स्थिति उस समय नहीं थी जब केंद्र सरकार ने पहली बार अगस्त 2024 में, लोकसभा चुनाव के बाद पहले संसद सत्र में वक्फ विधेयक पेश किया था। तब विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेज दिया गया था। कथित तौर पर भाजपा के अपने सहयोगियों—जनता दल (यूनाइटेड), तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) और लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी)—के दबाव पर, जो अपने अल्पसंख्यक समर्थन आधार को बनाए रखने के इच्छुक थे। यही दल अब इस विधेयक के फाइनल टच पर बीजेपी के सामने नतमस्तक हो गए। हालांकि टीडीपी दावा कर रही है कि उसके तीन सुझावों को जेपीसी ने माना और बदलाव किया। लेकिन जनता को इतनी महीन बातों से क्या लेना-देना। उसे तो बस यही दिख रहा है कि इन तीन दलों की वजह से बीजेपी विवादित वक्फ बिल को संसद के दोनों सदनों में पारित करा ले गई।

याद कीजिए अगस्त 2024 में, यह भाजपा के सहयोगी चिराग पासवान थे जिन्होंने संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) में लैटरल एंट्री की किसी भी योजना का विरोध किया। जिसके जरिए मोदी सरकार ने अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को ताक पर रख दिया था। सरकार को उस प्रस्ताव को वापस लेना पड़ा।

अगस्त में स्थिति और बेहतर नहीं हुई। जब उसके सहयोगी दलों की चिंताओं ने सरकार को प्रसारण सेवा (विनियमन) विधेयक की योजनाओं को भी स्थगित करने के लिए मजबूर कर दिया। उस समय यही लग रहा था कि एनडीए में सहयोगी दल अपनी ताकत दिखा रहे थे और फैसलों को वापस लेने के लिए मजबूर कर रहे थे।

वक्फ बिल को कानून बनाने में बीजेपी ने जो राजनीति अपनाई, उससे साबित हो गया कि मोदी सरकार ने अपनी खोई हुई ऊर्जा को फिर से पा लिया है और अपनी राजनीतिक सत्ता के प्रभुत्व को भी फिर से पा लिया है। यही चिराग पासवान, नीतीश कुमार, चंद्र बाबू नायडू जब रमज़ान और ईद पर इफ्तार दावतों में शामिल हो रहे थे, मुस्लिम टोपी लगा रहे थे तो लग रहा था कि बीजेपी का वक्फ कानून बदलने का सपना एक सपना ही रहेगा। लेकिन इन्हीं तीनों ने इफ्तार दावतों से अलग रुख वक्फ बिल के दौरान दिखाया। मुस्लिम समुदाय अब हतप्रभ है। उसने इनके रुख को देखते हुए ऐसी उम्मीद नहीं की थी।

बीजेपी के सहयोगियों की राजनीतिक मजबूरियों का भी इस स्थिति में बहुत बड़ा योगदान है। आंध्र प्रदेश में, मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू राज्य के लिए केंद्रीय धन और समर्थन प्राप्त करने के लिए उत्सुक हैं, जबकि बिहार में, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लगातार कमजोर स्वास्थ्य ने जेडीयू को भाजपा के राजनीतिक कार्यक्रमों के और करीब ला दिया है। एक तरह से, दोनों सहयोगी, एनडीए के इतिहास में पहले से कहीं अधिक, भाजपा के एजेंडे में शामिल हो गए हैं। एनडीए—जिसमें भाजपा, जेडीयू, एलजेपी, और हिंदुस्तान आवाम मोर्चा (एचएएम) शामिल हैं—आगामी बिहार चुनाव में एक ध्रुवीकरण मंच पर उतरेगा। अब उनमें से कोई भी बीजेपी से शिकायत करता नहीं दिख रहा है। जेडीयू तो खैर बिखरने के कगार पर है। अभी तक जेडीयू के 6 बड़े मुस्लिम नेता पार्टी छोड़कर जा चुके हैं।

संसदीय टकराव में कब कौन योद्धा बन जाए नहीं कहा जा सकता। लेकिन इस साल के बजट सत्र का दूसरा हिस्सा पूरी तरह से भाजपा के 2024 से पहले के अवतार में वापसी के बारे में है। उसने क्षेत्रीय दलों पर अपनी पकड़ मजबूत बना ली है। बिहार में उसने वो करिश्मा करके दिखाया है जो जल्द होने वाले विधानसभा में उसे बेहतर नतीजे दे सकता है। अब जेडीयू को उसकी छत्रछाया में लड़ना होगा और जितना टिकट बीजेपी देगी, उसे मानना पड़ेगा। 

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क़मर वहीद नक़वी
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