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सोनिया से नेहरू के काग़ज़ात वापस माँगने का मतलब क्या है?

नेहरू के ख़त माँगना दरअसल उसी सिलसिले की ताज़ा कड़ी है जिसके तहत गाँधी परिवार का चरित्रहनन किया जाता है। बीजेपी और आरएसएस की ओर से इस परिवार के ख़िलाफ़ जैसा असत्य अभियान चला है उसकी मिसाल नहीं है। 
पंकज श्रीवास्तव

प्रधानमंत्री म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी, यानी पीएमएमएल ने सोनिया गाँधी को पत्र लिखकर सोनिया गाँधी से जवाहरलाल नेहरू से जुड़े तमाम काग़ज़ात माँगे हैं। पीएमएमएल ने कहा है कि 51 बक्सों में बंद ये काग़ज़ात 2008 में सोनिया गाँधी को सौंपे गये थे। इनमें जयप्रकाश नारायण, एडविना माउंटबेटन, अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे दिग्गजों को लिखे नेहरू के पत्र शामिल हैं। पीएमएमएल का कहना है कि ये पत्र शोध के लिए ज़रूरी हैं, देश की धरोहर हैं। इस मामले में सोनिया गाँधी की प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आयी है लेकिन सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह गाँधी परिवार पर हमले के सिलसिले की ताज़ा कड़ी है?

प्रधानमंत्री म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी को 2022 के पहले नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी के रूप में जाना जाता था। यह दिल्ली के उसी तीन-मूर्ति भवन में स्थित है जहाँ देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू रहते थे। वे यहाँ आख़िरी साँस यानी 1964 तक रहे। तीन मूर्ति भवन आज़ादी की लड़ाई और आधुनिक भारत की नींव डालने वाले शख़्स की याद दिलाता है जिसने आज़ादी के लिए लगभग नौ साल जेल में बिताये थे। इसलिए नेहरू जी के निधन के बाद उनकी याद में एक संग्रहालय और लाइब्रेरी बनी। इस लाइब्रेरी में दुनिया भर से लोग शोध के लिए आते थे। इसकी लाइब्रेरी को बेहद समृद्ध माना जाता था। लेकिन भारत की हर समस्या के लिए नेहरू जी को दोषी ठहराने वाले पीएम मोदी को शायद यह पसंद नहीं आया। मोदी सरकार ने 2022 में इस म्यूज़ियम से नेहरू का नाम हटा दिया और इसे प्रधानमंत्री म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी यानी पीएमएमएल कर दिया। कहा गया कि इसमें नेहरू ही नहीं, सभी प्रधानमंत्रियों की यादें सहेजी जायेंगी।

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मोदी सरकार के इस क़दम के पीछे नेहरू को लेकर कुंठा झलकती है। आख़िर महान विभूतियों के घर को उनकी याद में संजोने का रिवाज़ तो दुनिया भर में है। भारत में भी नेहरू जी के बाद प्रधानमंत्री बने लालबहादुर शास्त्री जी का आवास उनकी याद में समर्पित है। वहाँ जाकर देखा जा सकता है कि शास्त्री जी कैसी सादगी से रहते थे। उनकी वह फ़िएट गाड़ी भी उसी आवास में खड़ी है जिसे उन्होंने लोन पर लिया था। डॉ. आंबेडकर के दिल्ली स्थित आवास को भी इसी तरह सहेजा गया है। लेकिन मोदी सरकार को पसंद नहीं आया कि अकादमिक और शोध जगत में एक प्रतिष्ठित जगह के साथ नेहरू का नाम जुड़ा हो। इसलिए नेहरू मेमोरियाल को प्रधानमंत्री म्यूज़ियम में बदल दिया गया जबकि ऐसा कोई म्यूज़ियम अलग से भी बनाया जा सकता था।

इस प्रधानमंत्री म्यूज़ियम के संचालन के लिए एक सोसायटी बनी जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री मोदी बनाये गये थे। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक फ़रवरी 2024 में सोसायटी के उपाध्यक्ष राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में नेहरू जी के निजी काग़ज़ात को सोनिया गाँधी से वापस लिये जाने पर चर्चा हुई थी। बैठक में तय हुआ था कि नेहरू जी से जुड़े काग़ज़ात के स्वामित्व, संरक्षण, कॉपीराइट और उपयोग पर क़ानूनी राय ली जाए। ये काग़ज़ात 1971 में नेहरू की उत्तराधिकारी बतौर इंदिरा गाँधी और बाद में सोनिया गाँधी की ओर से दान किये गये थे।

15 जनवरी 2025 को पीएमएमएल सोसायटी की कार्यकारी परिषद का पुनर्गठन हुआ और पीएम मोदी के पूर्व प्रधान सचिव नृपेंद्र मिश्र को अध्यक्ष बनाया गया। सोसायटी के अन्य सदस्यों में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और संस्कार भारती के वासुदेव कायथ भी शामिल हैं। नवगठित सोसायटी की पहली आम बैठक से पहले पत्र लिखकर सोनिया गाँधी से नेहरू के पत्र वापस माँगे गये हैं।
सोनिया गाँधी की ओर से इस पत्र का क्या जवाब दिया गया है, यह अभी मालूम नहीं है लेकिन इतना तो तय है कि सोनिया गाँधी इन पत्रों की वारिस हैं और उन्होंने पहले ख़ुद ही इन पत्रों को संग्रहालय को सौंपा था।
हो सकता है कि वे पत्र एक निश्चित अवधि के लिए दिये गये हों ताकि संग्रहालय उनकी प्रतियाँ बनवा ले जो शोधार्थियों के काम आयें। फिर मूल प्रति वापस ले ली गयी हो। क़ानूनी लिहाज़ से इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है। वैसे भी देश को दान देने के नेहरू परिवार के इतिहास को देखते हुए यह मानना मुश्किल है कि सोनिया गाँधी इन पत्रों पर बेज़ा क़ब्ज़ा चाहती हैं।
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1920 के दशक में जब गाँधी जी के नेतृत्व में कांग्रेस का आंदोलन तेज़ हुआ तो इलाहाबाद में वक़ालत के पेशे से अकूत कमाई करने वाले मोतीलाल नेहरू भी उनसे प्रभावित हुए। उन्होंने अंग्रेज़ी ढंग की ठाट-बाट वाली ज़िंदगी छोड़कर खादी पहन ली और अपना आलीशान घर कांग्रेस को सौंप दिया। इसी घर में 19 नवंबर 1917 को इंदिरा गाँधी का जन्म हुआ था। कांग्रेस ने इस भवन को अपना राष्ट्रीय मुख्यालय बनाया और इसका नाम स्वराज भवन रखा गया। परिवार के रहने के लिए उसी परिसर में एक नया घर आनंद भवन बनवाया गया। आज़ादी के आंदोलन में यह घर लगातार पुलिस के छापों और दमन का शिकार होता रहा। बाद में यह भवन देश को समर्पित कर दिया गया।

इसी तरह जवाहरलाल नेहरू ने भी अपनी सारी संपत्ति देश को दान कर दी थी। उन्होंने वसीयत की थी कि उनका सब कुछ देश का है। आज के हिसाब से नेहरू की ज़मीन-जायदाद सैकड़ों करोड़ में आँकी जा सकती है। इंदिरा गाँधी ने 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय अपने सारे गहने देश को दान कर दिये। इसके अलावा 1970 में आनंद भवन भी देश को समर्पित कर दिया जहाँ आज संग्रहालय बना हुआ है।

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नेहरू के ख़त माँगना दरअसल उसी सिलसिले की ताज़ा कड़ी है जिसके तहत गाँधी परिवार का चरित्रहनन किया जाता है। बीजेपी और आरएसएस की ओर से इस परिवार के ख़िलाफ़ जैसा असत्य अभियान चला है उसकी मिसाल नहीं है। आईटी सेल बन जाने के बाद इसमें कई गुना इज़ाफ़ा हुआ है। यहाँ तक कि नेहरू की उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित की आत्मीय तस्वीर को भी उनके चरित्र हनन का ज़रिया बनाया गया। नेहरू के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार की इंतेहा तो ये है कि लंबे समय तक उन्हें सुभाषचंद्र बोस के ख़िलाफ़ साज़िश करने वाला बताया गया। 2016 में आज तक के एक संपादक ने नेहरू का लिखा एक पत्र दिखाकर दावा किया कि नेहरू ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली से कहा था कि वे सुभाषचंद्र बोस के मिलने पर युद्धबंदी के रूप में ब्रिटेन को सौंप देंगे। हालाँकि यह पत्र बाद में फ़र्ज़ी साबित हुआ। उल्टा जब मोदी सरकार ने बहुचर्चित बोस फाइल्स को सार्वजनिक किया तो पता चला कि नेहरू ने सुभाष बोस की बेटी अनीता बोस के खर्चे के लिए कांग्रेस पार्टी के कोष से एक ट्रस्ट बनवाया था। इस ट्रस्ट से अनीता को उनकी शादी तक हर महीने पाँच सौ रुपये भेजे जाते थे।

इसी तरह नेशनल हेराल्ड केस भी है। 1937 में नेहरू जी ने नेशनल हेराल्ड अख़बार की स्थापना की थी। ये कांग्रेस पार्टी का अख़बार था। इसकी संपत्ति में फर्जीवाड़ा करने के आरोप में ईडी ने सोनिया और राहुल दोनों से लंबी पूछताछ की, जबकि कांग्रेस का दावा है कि एक भी पैसे का लाभ सोनिया या राहुल को नहीं मिला है। मामला कोर्ट में है, इसलिए ज़्यादा कुछ कहना ठीक नहीं है।

सवाल है कि गाँधी परिवार मोदी या बीजेपी के निशाने पर क्यों है? परिवारवाद जैसा आरोप तो पर्दा भर है। बीजेपी में ख़ुद परिवारवाद के उदाहरणों की भरमार है। सच्चाई ये है कि गाँधी परिवार ने मोदी सरकार से डरने या बिकने से इनकार कर दिया है जो बीजेपी की मौजूद राजनीतिक रणनीति का सबसे बड़ा दाँव है।

राहुल गाँधी को पप्पू साबित करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किये गये लेकिन वक़्त के साथ सारे झूठ सामने आ गये हैं। साथ ही, राहुल गाँधी आरएसएस पर बेहिचक हमलावर हैं और उसकी सामाजिक न्याय विरोधी और संविधान विरोधी वैचारिकी पर ज़ोरदार प्रहार कर रहे हैं। यही नहीं, राहुल जेल जाने से भी नहीं डर रहे हैं। ऐसा लगता है कि हर वक़्त जेल जाने के लिए तैयार हैं। घूम-घमकर देश भर में संविधान सम्मेलन कर रहे हैं। ऐसे में बीजेपी, आरएसएस को लगता है कि गाँधी परिवार के राजनीति में रहते वे निश्चिंत नहीं रह सकते। 

राहुल गाँधी अपनी लड़ाई को नफ़रत के बाज़ार में मुहब्बत की दुकान खोलना कहते हैं। यानी यह दो विचारधाराओं की लड़ाई है और विचारधाराओं की लड़ाई ज़रा लंबी चलती है। फिर एक दिन झूठ का अंधेरा छँटता है और सूरज निकलता ही है। ये बात हमें सबसे ज़्यादा नेहरू के ख़तों से पता चलती है। काश इन ख़तों पर दावा करने वाले उन्हें पढ़ भी पाते।

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