कहते हैं कि हर समाज हर देश के अपने रंग होते हैं। यह बात सिर्फ मुहावरे की नहीं है। अगर हम खालिस रंग की ही बात करें तो रंगों को लेकर हर समाज की अपनी पसंद और नापसंद होती है। यह किसी भी समाज के अतीत से निकलती है और कईं बार उसे भविष्य की ओर ले जाती है। रंगों की इस पसंद और नापसंद को लेकर कोई दिक्क़त भी नहीं है, दिक्क़त तब होती है जब कुछ रंगों से खास किस्म के आग्रह ही नहीं नफ़रत तक जोड़़ दी जाती है।

भारत में नफ़रत के ये रंग 20वीं सदी की शुरुआत के साथ दिखने शुरू हुए। इसके पहले तक रंग माहौल में रंग भरने के अलावा कोई और काम करते हों ऐसा बहुत कम ही दिखाई देता है। पढ़िए, चार साल पहले लिखा हरजिंदर का यह लेख...
भारत में नफ़रत के ये रंग 20वीं सदी की शुरुआत के साथ दिखने शुरू हुए। इसके पहले तक रंग माहौल में रंग भरने के अलावा कोई और काम करते हों ऐसा बहुत कम ही दिखाई देता है। यह बात अलग है कि रंगों में नफ़रत भरने के लिए अक्सर बहुत पुराने अतीत के उदाहरण ज़रूर पेश किए जाते हैं।