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महाकुंभ के दौरान योग गुरु रामदेव के साथ सीएम योगी आदित्यनाथ

आलोचकों को गिद्ध और सुअर बताकर ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते योगी!

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कुंभ के दौरान भगदड़ में हुई मौतों और गंगा में प्रदूषण के सवाल पर जैसा जवाब दिया है, वह लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की बुनियादी मर्यादा का भी उल्लंघन है। जवाबदेह शासन लोकतंत्र की कसौटी है, पर योगी आदित्यनाथ का व्यवहार इसके उलट है। उन्होंने प्रयागराज कुंभ के दौरान भगदड़ में हुई श्रद्धालुओं की मौतों और गंगा प्रदूषण पर सवाल उठाने वालों को जवाब देते हुए विधानसभा में कहा-“महाकुंभ में जिसने जो तलाशा उसको वो मिला। गिद्धों को लाश मिली, सुअरों को गंदगी मिली जबकि संवेदनशील लोगों को रिश्तों की सुंदर तस्वीर मिली, सज्जनों को सज्जनता मिली, व्यापारियों को धंधा मिला, श्रद्धालुओं को साफ़-सुथरी व्यवस्था मिली... जिसकी जैसी नियति थ दृष्टि थी, उसको वैसा मिला।”

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महाकुंभ प्रयागराज में भीड़ को रोकने की कोशिश करती पुलिस। फाइल फोटो

कुंभ की भगदड़ों में कितने लोग मारे गये, इसका ठीक आँकड़ा अब तक जारी नहीं हुआ। जिन श्रद्धालुओं की लाशें उनके घर वापस गयी हैं, उनके घर मातम है। योगी आदित्यनाथ निश्चित ही जान गँवाने वालों के परिजनों को ‘गिद्ध' नहीं कह रहे हैं ’जिन्हें ये लाशें मिलीं’। वे उन्हें गिद्ध कह रहे हैं, जिन्होंने इन दुर्घटनाओं को योगी के शासन-प्रशासन की विफलता के रूप में चिन्हित किया है। उसी तरह ‘सुअर’ की उपाधि उन्होंने उनके लिए दी है जिन्होंने कुंभ में गंदगी, ख़ासतौर पर गंगा जल के प्रदूषण का सवाल उठाया है।

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योगी का जवाब सामान्य लोकतांत्रिक व्यवहार के उलट है। दुर्घटनाएँ, जब और जहाँ होती हैं, व्यवस्था पर सवाल उठते ही है। विपक्ष में रहते हुए ख़ुद भारतीय जनता पार्टी हमेशा सवाल उठाने का इस अधिकार का इस्तेमाल करती रही है। तो क्या योगी जी भी ख़ुद को 'ईश्वर की छाया’ मानने लगे हैं जिनके शासन पर सवाल उठाना अधर्म है? गंगा प्रदूषण का सवाल तो इस देश के सामने कई दशकों से ज्वलंत सवाल बनकर खड़ा हुआ है। यह सवाल केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने उठाया है। उसने साफ़ कहा है कि गंगा और यमुना काजल नहाने और पीने के योग्य नहीं है। यह कोई विपक्ष की संस्था नहीं है। केंद्र की मोदी सरकार के अधीन है। सवाल है कि योगी जी सुअर किसे बोल रहे हैं? जब वे प्रदूषण के सवाल को छवि धूमिल करने का विपक्ष का प्रास बताते हैं तो वे सहज ही केंद्र सरकार को अपना विपक्ष घोषित कर देते हैं!

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महाकुंभ में भगदड़ के बाद का दृश्य

इन पंक्तियों के लेखक ने प्रयागराज में 2007 का अर्धकुंभ और 2013 का कुंभ एक टीवी पत्रकार बतौर कवर किया था। उस समय भी भारी भीड़ जुटी थी लेकिन कुंभ स्नान न करने वालों को ‘अधर्मी’ बताने की कोई कोशिश नहीं की जाती थी।भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अरसे से जारी प्रोटोकॉल का पालन किया जाता था जिसमें वीआईपी के लिए लोगों को क़ैद करने जैसा ‘अपराध’ शामिल नहीं था, जैसा कि इस बार देखने को मिला।यह भी  याद नहीं कि तब मोदी, अमित शाह से लेकर योगी आदित्यनाथ तक संगम स्नान के लिए पहुँचे थे जो आज कुंभ न जाने वालों की आस्था पर सवाल उठा रहे हैं। उस समय गंगा जल के प्रदूषण की दैनिक मॉनीटरिंग की जाती थी और जैसे ही प्रदूषण फैलाने वाले तत्व बढ़ते थे, मीडिया हंगामा मचा देता था। सरकारें सफ़ाई की मुद्रा में आ जाती थीं और बड़ी मात्रा में पानी छोड़ने से लेकर तमाम उपाय किये जाते थे जिससे लोगों को कुंभ के दौरान नहाने का साफ़ पानी मिलता रहे। ऐसे सवालों को विपक्षी की साज़िश नहीं बताया जाता था।

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भगदड़ में मृत और घायलों को तलाशते लोग। फाइल फोटो

ग़नीमत है कि योगी आदित्यनाथ ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल को विपक्षी साज़िश का हिस्सा या सुअर नहीं कहा है जिसने उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से गंगा प्रदूषण पर रिपोर्ट माँगी थी। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जनवरी में सत्तर से ज़्यादा स्थानों से गंगा और यमुना का पानी बतौर सैंपल उठाया था और उसकी जाँच करायी थी। 3 फ़रवरी को सौंपी गयी रिपोर्ट के मुताबिक़ सभी सैंपल में फ़ीकल कोलीफ़ार्म (मानव मल में पाया जाने वाला बैक्टीरिया) मानक से दस गुना अधिक था। इसलिए बोर्ड ने कहा कि पानी न नहाने योग्य है और न पीने योग्य।

इस रिपोर्ट से बौखलायी योगी सरकार ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को आगे कर दिया जिसने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के उलट रिपोर्ट दी। केंद्रीय बोर्ड की रिपोर्ट को घेरने के लिए एक ‘पद्मश्री वैज्ञानिक’ भी सामने किये गये जिन्होंने दावा किया कि गंगा जल प्रदूषित हो ही नहीं सकता। यह तो 'अल्केलाइन वाटर’ से ज़्यादा शुद्ध है। ऐसे दावों को मीडिया में खूब जगह मिली। कुल मिलाकर गंगा में प्रदूषण का सवाल को ‘अधर्म’ की तरह पेश किया गया।

लेकिन क्या सचमुच गंगा जल के प्रदूषण का सवाल उठाना सुअर होना है? तो फिर मोदी सरकार की ‘नमामि गंगे परियोजना’ क्या है जिस पर करोड़ों रुपये हर साल खर्च होते हैं? अगर गंगा जल प्रदूषित हो ही नहीं सकता तो फिर उस पर सरकारी ख़ज़ाना लुटाने का क्या मतलब? क्या योगी आदित्यनाथ प्रधानमंत्री से इस फ़िज़ूल ख़र्च पर रोक लगाने की माँग करेंगे?

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महाकुंभ के दौरान संगम में स्नान करते साधु-संत। फाइल फोटो

योगी सरकार ने ‘महाकुंभ’ में रिकार्ड भीड़ लाने के लिए सारे जतन किये। इस आध्यात्मिक आयोजन को एक तरह से हिंदुत्व के शक्ति प्रदर्शन से जोड़ा गया। लेकिन ये भुला दिया गया कि कुंभक्षेत्र ही नहीं, प्रयागराज पहुँचने के रास्ते भी सीमित हैं। देशव्यापी स्तर पर फैलाये गये उन्माद का नतीजा हुआ कि प्रयागराज जाने वाले रास्ते कई-कई दिन तक जाम रहे और पूरा शहर थम गया। लोगों को अपने घरों में क़ैद रहना पड़ा। स्कूल, कॉलेज से लेकर दफ़्तरों तक का काम बुरी तरह प्रभावित हुआ। आम दिनों में भी प्रयागराज शहर के सीवेज का बड़ा हिस्सा बिना ट्रीटमेंट के नदी में डाला जाता है। ऐसे में कल्पना ही की जा सकती है कि तीस-चालीस करोड़ लोगों के इस शहर में पहुँचने और नैसर्गिक ज़रूरतों को पूरा करने के क्रम में पैदा हुई कितनी गंदगी गंगा-यमुना में डाली गयी होगी। 

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लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चाहते हैं कि इस गंदगी और अव्यवस्था पर कोई सवाल न उठाया जाये। ऐसा करने वाले गिद्ध और सुअर हैं। अपने विरोधियों को इस क़दर वही अपमानित कर सकता है जिसके मन में लोकतंत्र के प्रति ज़रा भी आस्था न हो। वे चाहते हैं कि धर्म के प्रति आस्था इतनी प्रगाढ़ हो कि प्रदूषित जल भी पवित्र लगने लगे। यह धर्म को आध्यात्मिक उद्योग नहीं, लोगों को अंधा बनाने की जुगत समझना है। यह धर्म के नाम पर ‘अधर्म’ है। सवाल उठाने वालों को गिद्ध और सुअर बताकर अपनी ज़िम्मेदारी से नहीं बचे सकते योगी आदित्यनाथ।

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क़मर वहीद नक़वी
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