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ट्रंप के जन्मजात नागरिकता वाले आदेश पर मुक़दमा क्यों; भारतीय होंगे प्रभावित?

राष्ट्रपति बनते ही डोनाल्ड ट्रंप ने जन्मजात नागरिकता ख़त्म करने के लिए जो कार्यकारी आदेश निकाला उस पर मुक़दमा दर्ज किया गया है। अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन ने यह मुक़दमा दायर किया है। उस कार्यकारी आदेश में अमेरिका में पैदा हुए उन बच्चों के लिए जन्मजात नागरिकता ख़त्म करने की बात की गई है, जिनके माता-पिता वैध रूप से अमेरिका में नहीं हैं। ट्रंप के इस आदेश के लागू होने से अमेरिका में रह रहे बड़ी संख्या में भारतीय भी प्रभावित होंगे।

भारतीय सहित अमेरिका पहुँचने वाले आप्रवासियों पर किस तरह का असर होगा, ट्रंप का यह कार्यकारी आदेश संविधान के प्रावधानों के ख़िलाफ़ क्या लागू हो पाएगा और क्या संविधान को बदलना ट्रंप के लिए इतना आसान होगा? इन सवालों के जवाब बाद में, पहले यह जान लें कि ट्रंप का कार्यकारी आदेश क्या है और किसने इसके ख़िलाफ़ मुक़दमा किया है।

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चार साल बाद व्हाइट हाउस में वापस लौटे 54वें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को कई कार्यकारी आदेशों पर हस्ताक्षर करके अपनी शुरुआत की, जिनमें से सबसे प्रमुख था जन्मजात नागरिकता को रद्द करना। इसने गैर-नागरिक माता-पिता से अमेरिका में जन्मे बच्चों को अपने आप मिलने वाली नागरिकता को ख़त्म करने की पहल की। इस घोषणा के तुरंत बाद ही अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन ने मुक़दमा दायर किया। 

यूनियन के कार्यकारी निदेशक एंथनी डी. रोमेरो ने एक बयान में कहा, 'अमेरिका में जन्मे बच्चों को नागरिकता देने से इनकार करना न केवल असंवैधानिक है, बल्कि यह अमेरिकी मूल्यों को लापरवाही और निर्ममता से नकारना भी है। जन्मजात नागरिकता संयुक्त राज्य अमेरिका को एक मजबूत और गतिशील राष्ट्र बनाती है। यह आदेश अमेरिकी इतिहास की सबसे गंभीर गलतियों में से एक को दोहराने का प्रयास करता है, जिसमें अमेरिका में जन्मे लोगों का एक स्थायी उपवर्ग बनाया जा रहा है, जिन्हें अमेरिकी के रूप में पूर्ण अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।'

यूनियन ने न्यू हैम्पशायर में लोगों की ओर से मुक़दमा दायर किया है जिनके बच्चों को आदेश के तहत नागरिक के रूप में मान्यता नहीं दी जाएगी, जिसमें तर्क दिया गया है कि यह आदेश 14वें संशोधन के साथ-साथ प्रशासनिक प्रक्रिया अधिनियम का भी उल्लंघन करता है।

14वें संशोधन में कहा गया है, 'संयुक्त राज्य अमेरिका में जन्मे या प्राकृतिक रूप से बसे सभी व्यक्ति और उसके अधिकार क्षेत्र के अधीन, संयुक्त राज्य अमेरिका के नागरिक हैं।' यह प्रावधान 1868 में लागू किया गया था और इसे अमेरिका में जन्मे सभी व्यक्तियों को नागरिकता देने के लिए डिज़ाइन किया गया था। 

जन्मजात नागरिकता संविधान के 14वें संशोधन से मिलती है, जिसे अमेरिकी गृहयुद्ध के ख़त्म होने के तीन साल बाद 1868 में मंजूर किया गया था।

आदेश के सामने क़ानूनी चुनौतियाँ

हालाँकि ट्रम्प ने कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन इसके सामने बहुत सारी क़ानूनी बाधाएँ हैं। इसके अलावा, संविधान के प्रावधानों को बदलने के लिए एक संवैधानिक संशोधन की ज़रूरत होगी।

अमेरिकी संविधान में संशोधन करने के लिए सदन और सीनेट दोनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, उसके बाद तीन-चौथाई राज्य विधानसभाओं से समर्थन की आवश्यकता होती है। नए सीनेट में डेमोक्रेट्स के पास 47 सीटें हैं, जबकि रिपब्लिकन के पास 53 सीटें हैं। सदन में डेमोक्रेट्स के पास 215 सीटें हैं, और रिपब्लिकन के पास 220 सीटें हैं।

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बता दें कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने भी जन्मजात नागरिकता को बरकरार रखा है, जिसमें यूनाइटेड स्टेट्स बनाम वोंग किम आर्क (1898) का ऐतिहासिक मामला भी शामिल है। यहाँ कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया था कि गैर-नागरिक माता-पिता से अमेरिका में जन्मा बच्चा अभी भी अमेरिका का नागरिक है। ट्रंप के कार्यकारी आदेश के ख़िलाफ़ तर्क यह है कि यह संशोधन प्रक्रिया का पालन किए बिना संवैधानिक गारंटी को रद्द नहीं कर सकता है, जिसके लिए कांग्रेस में बहुमत और राज्यों में दो-तिहाई वोट की ज़रूरत होगी।

भारतीयों पर असर क्या?

अमेरिका में भारतीय-अमेरिकी समुदाय काफी बड़ी संख्या में है। 2024 तक भारतीय अमेरिकियों की संख्या 54 लाख के आसपास है। यह अमेरिकी आबादी का क़रीब 1.47% है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार आधिकारिक आंकड़े हैं कि लगभग दो-तिहाई अप्रवासी हैं, जबकि 34% अमेरिका में जन्मे हैं। यदि नीति ट्रंप के कार्यकारी आदेश के अनुसार बदलती है, तो अस्थायी कार्य वीजा पर रहने वाले या ग्रीन कार्ड का इंतज़ार कर रहे भारतीय नागरिकों के बच्चों को अपने आप अमेरिकी नागरिकता नहीं मिलेगी। इसका असर हर साल अमेरिका में रहने वाले भारतीय प्रवासियों के हज़ारों बच्चों पर पड़ेगा।

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क़मर वहीद नक़वी
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