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हिन्दू-मुसलिम कट्टरपंथी
रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि 1946-47 के दंगों के बाद हिन्दू और मुसलमान, दोनों ही पक्षों के कट्टरपंथी हावी हो चुके थे। मुसलमानों की तरफ़ से मुसलिम नेशनल गार्ड्स और ख़ाकसार थे तो हिन्दुओं की ओर हिन्दू महासभा और आरएसएस ने मोर्चा संभाला हुआ था। संघ की स्थापना 1925 में हुई, पर अब तक एम. एस. गोलवलकर इसके मुखिया बन चुके थे। गोलवलकर कट्टरपंथी विचारों के थे और भारत से हर तरह के ग़ैर-हिन्दू प्रभावों को दूर करने के लिए कटिबद्ध थे। आरएसएस के काडरों ने पंजाब में हुई हिंसक गतिविधियों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। वह अब दिल्ली पर अपनी पकड़ बनाना चाहता था और शहर में हिन्दू और सिख शरणार्थियों की मौजूदगी का पूरा फ़ायदा उठाना चाहता था।गाँधी ने की थी संघ की तारीफ़
महात्मा गाँधी ने सितंबर 1947 में दिल्ली की हरिजन बस्ती में आरएसएस कार्यकर्ताओं से मुलाक़ात की थी। उन्होंंने संघ के अनुशासन और छुआछूत से दूर रहने की वजह से उसकी काफ़ी प्रशंसा की थी। गाँधी ने उनसे कहा कि ‘सही अर्थों में उपयोगी होने के लिए यह ज़रूरी है कि आत्मत्याग को उद्देश्य की शुद्धता और सच्चे ज्ञान से जोड़ा जाए।’“
जब रोम जल रहा था, नीरो बाँसुरी बजा रहा था। हमारी आँखों के सामने इतिहास अपने आप को दुहरा रहा है। महात्मा गाँधी कलकत्ता से इसलाम की तारीफ कर रहे हैं, अल्लाह-ओ-अक़बर का नारा बुलंद कर रहे हैं और हिन्दुओं से भी ऐसा करने को कह रहे हैं। यह ऐसे समय हो रहा है जब पंजाब और दूसरी जगहों पर इसलाम और अल्लाह-ओ-अक़बर के नाम पर सबसे शर्मनाक बर्बरताएँ और क्रूरताएँ की जा रही हैं।
'ऑर्गनाइज़र' में छपे लेख का अंश
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महात्मा गाँधी के पास इसका अभूतपूर्व मौक़ा है कि वह हिन्दुओं को संगठित और एकजुट करें, अंदर और बाहर से उन्हें और हिन्दुस्तान को ऐसा बनाएँ कि आक्रामक राष्ट्र भी उन्हें स्वीकार कर लें।
'ऑर्गनाइज़र' में छपे लेख का अंश
गाँधी की आलोचना
गुहा ने लिखा कि इस तरीके से आरएसएस ने गाँधी की आलोचना की और उन पर दुख भी जताया। उसके कहने का मतलब यह था मानो गाँधी अपनी स्थिति का प्रयोग कर हिन्दुओं की अगुआई करें और मुसलमानों को उनकी हैसियत बताएँ, साथ ही दुनिया के देशों के बीच हिन्दुस्तान को गौरवशाली जगह दिलाएँ।गुहा दिल्ली पुलिस के एक सिपाही की डायरी खंगालते हैं। उस सिपाही को संघ की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए तैनात किया गया था। उस सिपाही ने लिखा, ‘संघ की कोशिश यह थी कि हिन्दुओं को भौतिक रूप से मजबूत बनाया जाए और हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की जाए। आरएसएस का मानना था कि मौजूदा सरकार शत प्रतिशत हिन्दू सरकार नहीं थी, इसके बावजूद वह इसका विरोध नहीं करेगा क्योंकि उसकी मदद से ही वह हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करेगा।’
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आरएसएस कार्यकर्ताओं का कहना है कि मुसलमान भारत छोड़ कर तभी जाएँगे जब उन्हें पूरी तरह ख़त्म कर देने का वैसा ही अभियान छेड़ा जाएगा जैसा कुछ दिन पहले दिल्ली में छेड़ा गया था। वे महात्मा गाँधी के बाहर जाने का इंतजार कर रहे थे क्योंकि वे जानते थे कि जब तक गाँधी मौजूद हैं, वे अपने इरादों को अमल में नहीं ला पाएँगे। वे इस विचार के थे कि यदि आने वाले ईद-उल-ज़ुहा त्योहार में किसी भी गोवंश की क़ुर्बानी दी गई, जिसकी भनक भी संघ के लोगों को लग गई तो दिल्ली में सांप्रदायिक गड़बड़ियाँ होने की पूरी संभावना है।
एक पुलिस सिपाही की डायरी का एक अंश
हथियार हासिल करने की कोशिश
गुहा लिखते हैं कि गोलवलकर नवंबर 1947 में दिल्ली लौट आए, उन्होंने आरएसएस के काडर से पैसे उगाहे, कार्यकर्ताओं से मुलाक़ात की और दिल्ली में संघ की स्थिति का जायजा लिया। इंटेलीजेंस ब्यूरो की 15 नवंबर की रिपोर्ट में कहा गया था कि ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता, ख़ास कर, पश्चिमी पंजाब से आए लोग दिवाली के मौके पर दिल्ली में कुछ सांप्रद्रायिक गड़बड़ियाँ फैला सकते हैं। उनका कहना है कि वे यह क़तई नहीं देख सकते कि मुसलमान दिल्ली में घूम-घूम कर व्यवसायियों से पैसे इकट्ठा करते रहें और हिन्दू व सिख जिनकी ग़लती सिर्फ़ इतनी है कि उन्होंने मुसलिम लीग और पाकिस्तान की स्थापना का विरोध किया, वे इस तरह दर-दर की ठोकरें खाएँ और भूख से और इस ठंड में ठिठुर कर मर जाएँ। ख़बर यह है कि ये लोग हथियार लाने गए हैं।’अपने मुँह मियाँ मिट्ठू!
दिल्ली राष्ट्रीय स्वयंसवेक संघ का सालाना उत्सव रामलीला मैदान में 7 दिसंबर को मनाया गया। गोलवलकर मुख्य वक्ता थे और वह तक़रीबन डेढ़ घंटे तक बोलते रहे। उन्होंने अपनी पीठ थपथपाने के साथ ही अपने भाषण की शुरुआत की। उन्होंने कहा, ‘पूरे देश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इतनी ज़्यादा शाखाएँ हो चुकी हैं कि बारी-बारी से सबको देखने में 20-25 साल लग जाएँगे। लोग इस गति से संगठन के विस्तार पर आश्चर्य कर रहे हैं क्योंकि कुछ साल पहले तक किसी ने इस बारे में सुना ही नहीं था न ही प्रेस में कुछ छपा था।’गोलवलकर ने कहा, ‘हमें शिवाजी की तरह ही छापामार युद्ध की रणनीति के लिए तैयार होना चाहिए। जब तक पाकिस्तान ख़त्म नहीं हो जाता, संघ शांति से नहीं बैठ सकता। यदि कोई हमारे रास्ते में आता है तो हमें उससे लड़ना होगा, भले ही वह नेहरू सरकार हो या कोई दूसरा आदमी।’
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गोलवलकर ने कहा कि दुनिया की कोई ताक़त मुसलमानों को हिन्दुस्तान में नहीं रख सकती। उन्हें देश छोड़ना ही होगा। महात्मा गाँधी मुसलमानों को देश में रखना चाहते हैं ताकि चुनाव के समय कांग्रेस को फ़ायदा हो, लेकिन उस समय तक देश में एक भी मुसलमान नहीं रहेगा। महात्मा गाँधी उन्हें और गुमराह नहीं कर सकते। हमारे पास ऐसे उपाय हैं जिससे ऐसे लोगों को तुरन्त शांत किया जा सकता है, पर यह हमारी परंपरा है कि हम हिन्दुओं से शत्रुता नहीं रखते। यदि हमें विवश किया गया तो हम वह रास्ता अपनाने पर भी मजबूर हो सकते हैं।
सीआईडी इंस्पेक्टर करतार सिंह की डायरी का अंश
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