अमेरिका अब भारत की नकल कर रहा है। हैरान नहीं हों। वहां भी तमाम यूनिवर्सिटी कैंपस में विचारों को दबाया या कुचला जा रहा है। ट्रम्प की नीतियां ‘मैककार्थी युग’ की याद दिला रही हैं। स्तंभकार अपूर्वानंद के इस लेख को जरूर पढ़ियेः
किसी मुल्क में हर मोर्चे पर जब हालात बदतर होते हैं तो लोग बौद्धिक लोगों की तरफ देखते हैं। लेकिन जनता चाहे तो खुद अपनी रोशनी बन सकती है। जहां भी है वो चाहे तो एक दीप से दूसरा दीप जला सकती है। वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार त्रिपाठी ने एक मशहूर मराठी कविता के जरिये अपनी बात कही है, जरूर पढ़ियेः