मतदाताओं के बदलते रुझान के चलते पहले राउंड की आठ सीटों में से सिर्फ़ एक सहारनपुर की सीट पर अब तक लड़ाई में माने जा रहे कांग्रेस के उम्मीदवार इमरान मसूद आख़िरी दो-तीन दिनों में बड़ी मुश्किल में फँस गये हैं। रविवार को हुई गठबंधन की देवबंद रैली ने उनके लिए ख़तरा पैदा कर दिया है जिसमें उनके समाज के क़रीब एक लाख लोगों ने शिरकत की।
हालाँकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश से सटे उत्तराखंड में सभी पाँच सीटों पर कांग्रेस ही बीजेपी से ढीले-ढाले मुक़ाबले में है पर इसका कोई असर उत्तर प्रदेश में पहले राउंड की किसी सीट पर नहीं है। उत्तर प्रदेश की बयार बिलकुल अलग है।
गठबंधन की देवबंद रैली को ज़बरदस्त मीडिया कवरेज भी मिली। उत्तर प्रदेश पर पैनी नज़र रखने वाले क़ाबिल पत्रकारों की टोली भी वहाँ थी। प्रसिद्ध पत्रकार राधिका रामाशेषन और सिद्धार्थ कलहंस ने रैली में हुई जन भागीदारी के महत्व को अपने सोशल मीडिया पेजों पर विस्तार से शेयर किया।
देवबंद से कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ चुके तोमर ने माना कि गठबंधन की रैली के बाद उनके उम्मीदवार के पक्ष में अगले दो दिनों में सामाजिक ध्रुवीकरण संभव है। हालाँकि उन्हें राहुल गाँधी के सहारनपुर में हो रहे रोडशो पर भी भरोसा था लेकिन ख़राब मौसम के कारण यह भी रद्द हो गया।
मैंने इस बीच उत्तर प्रदेश में कांग्रेस प्रत्याशियों द्वारा लड़ी जा रही कुछ उन सीटों को कवर कर रहे तमाम पत्रकारों और राजनेताओं से बातचीत की जिन्हें अमेठी, रायबरेली के अलावा कांग्रेस की मज़बूत सीट माना जा रहा था।
मुरादाबाद में कांग्रेस ने बेहद पॉपुलर शायर इमरान प्रतापगढ़ी को मैदान में उतारा है। पुराने आकलन के अनुसार पूरी संभावना थी कि वह अल्पसंख्यकों के कम से कम दो लाख वोट पा सकते हैं लेकिन इस समुदाय से मिले फ़ीडबैक से पता चला कि अब इमरान के लिये एक लाख मतों का आँकड़ा छूना भी मुश्किल हो सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि वह यह साबित नहीं कर पा रहे हैं कि उन्हें किसी और समुदाय से कितने वोट मिल रहे हैं? सवाल यह उठता है कि आख़िर वह चुनाव लड़ क्यों रहे हैं? क्या गठबंधन प्रत्याशी के वोट काटकर उन्हें हराने के लिये?
कांग्रेस के अत्यंत प्रभावशाली घोषणापत्र की मौजूदगी के बावजूद यह पार्टी उत्तर प्रदेश के किसी समाज में इस चुनाव में अपनी प्रासंगिकता का ऐसा तर्क पेश नहीं कर पा रही है, जिससे मतदाताओं का कोई हिस्सा प्रभावित हुआ दिखता हो।
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उन्नाव में भी कांग्रेस मुश्किल में
गठबंधन की प्रासंगिकता की बयार ने उन्नाव में कांग्रेस प्रत्याशी अन्नू टंडन की मज़बूत मानी जा रही सीट तक पर भी दुविधा खड़ी कर दी है। बीजेपी के विवादित सांसद साक्षी महाराज यहाँ अपना टिकट बचाने में ज़रूर कामयाब रहे पर वह अपने कार्यकाल में अलोकप्रिय रहे, यह उनकी पार्टी का नेतृत्व जानता था और इसीलिये वह उनका टिकट बदल रहा था।
अन्नू टंडन रिलायंस ग्रुप के वरिष्ठतम अधिकारियों में से एक अधिकारी के परिवार से हैं और 2009 में इसी सीट से सांसद रह चुकी हैं। टंडन क्षेत्र में उपस्थिति बनाये रखती हैं और शाहख़र्ची से चुनाव लड़ने में सक्षम हैं।
धौरहरा, फ़र्रुख़ाबाद में हालत कमज़ोर
धौरहरा में जितिन प्रसाद और फ़र्रुख़ाबाद में सलमान ख़ुर्शीद के चुनाव को वहाँ के स्थानीय पत्रकार समवेत में कमज़ोर बता रहे हैं। 2014 के चुनाव में दोनों चौथे स्थान पर थे। दोनों के पास पुरानी पारिवारिक और निजी विरासत है। इसलिये इनके पास सम्मानजनक पराजय का विकल्प है लेकिन जीत की कोई संभावना दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही क्योंकि एसपी-बीएसपी का गठबंधन हो जाने से इनकी आमने-सामने आने की कोई सूरत ही नहीं बन पा रही है। धौरहरा में तो 2014 में एसपी-बीएसपी का संयुक्त वोट जीते हुए बीजेपी सांसद से भी डेढ़ गुना था।
प्रतापगढ़ में रत्ना सिंह, कानपुर में पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल, अकबरपुर में राजाराम पाल और फ़तेहपुर सीकरी में राजब्बर चुनाव लड़ रहे हैं। ग़िनती ग़िनने के लिये लखीमपुर खीरी, झाँसी, फ़ैज़ाबाद और सुल्तानपुर जैसी सीटें भी हैं। बड़े नाम और पुराने अखाड़िये होने का लाभ इन्हें यह मिला कि चुनाव की शुरुआत में संभावित सफल उम्मीदवारों के तौर पर इन्हें गिनकर कांग्रेस के उत्तर प्रदेश में विजयी हो सकने वाले सांसदों की आठ-दस की संख्या के एलान में यह लोग ख़बरों में जगह पा गये।
एक बार को ऐसा लगा कि कांग्रेस को साथ न लेकर मायावती-अखिलेश ने ग़लती की पर चुनाव के आगे बढ़ते ही ज्यों-ज्यों ज़मीन की गर्मी और सामाजिक ध्रुवीकरण सामने आये तो पता चला कि ज़्यादा से ज़्यादा 5 सीटों के सिवा कांग्रेस इस बार तो यूपी में ढंग की वोटकटवा पार्टी भी नहीं है।
अब जब मायावती, अखिलेश और अजित सिंह लश्कर लेकर जनसभाएँ शुरू कर चुके हैं और इन्हें बीजेपी को हराने के ख़्वाहिशमंद मतदाताओं का बड़े पैमाने पर समर्थन मिल रहा है, तब कांग्रेस से पैर टिकाये रखने की उम्मीद बेमानी है।
दरअसल, सिवाय रायबरेली के उत्तर प्रदेश में कोई ऐसी सीट नहीं है जिसे कांग्रेस जिताऊ सीटों में गिनवा सके और तर्क और तथ्यों से यह साबित कर सके कि यह सीट वह जीत रही है। ऐसे विकट दौर में ठीक चुनाव के वक़्त प्रियंका गाँधी को ख़र्च कर कांग्रेस ने देश के सबसे बड़े राज्य में अपना भविष्य ख़तरे में डाल लिया है! बीजेपी जो कांग्रेस मुक्त भारत का स्वप्न देखती रही है उसको ख़ुद कांग्रेस ने चैन की नींद सौंप दी है!
दरअसल, उत्तर प्रदेश में सामाजिक ध्रुवीकरण संपूर्ण हो चुका है। सवर्ण और पिछड़ों की कुछ जातियाँ पूरी तरह बीजेपी के पीछे लामबंद हैं तो यादव, जाटव और अल्पसंख्यक गठबंधन के साथ हैं।
अजित सिंह के जरिये गठबंधन जाटों में सेंध लगा रहा है तो बीजेपी को कांग्रेस और शिवपाल यादव पर भरोसा है कि वे दर्जन भर सीटों पर उसके लिये शहीद हो सकते हैं।
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