यूक्रेन संकट की काली छाया दुनिया के दो अग्रणी संगठनों जी-20 और ब्रिक्स पर दिखाई पड़ने लगी है। इस साल अक्टूबर के अंत में इंडोनेशिया को जी-20 की शिखर बैठक की मेजबानी करनी है जिसमें रूस और अमेरिका के नेताओं को भी अहम सदस्यों के तौर पर आमंत्रित किया जाएगा।
इस शिखर बैठक के पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा है कि जी-20 से रूस को निष्कासित किया जाए। बाइडन के इस प्रस्ताव पर जी-20 के सभी सदस्य देशों के बीच आम राय नहीं बन सकती क्योंकि इसमें चीन भी एक महत्वपूर्ण सदस्य है। जी-20 के कई सदस्य देशों ने यूक्रेन मसले पर रूस की सीधी निंदा भी नहीं की है। ऐसे में यदि जी-20 से रूस को निकालने की मांग पर विचार किया जाता है तो जी-20 में फूट पड़ जाएगी और जी-20 शिखर बैठक का आयोजन नहीं हो सकेगा।
दूसरी ओर दुनिया के पांच देशों के अग्रणी संगठन ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) की शिखर बैठक की मेजबानी भी चीन को इस साल के उत्तरार्द्ध में करनी है जिसके लिये निमंत्रण देने चीन के विदेश मंत्री वांग ई 25 मार्च को भारत आए थे। चूंकि ब्रिक्स में रूस भी एक अहम साझेदार है इसलिये ब्रिक्स शिखर बैठक के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री के रूसी नेता व्लादिमीर पुतिन के साथ मेलजोल करने पर यूरोपीय और अमेरिकी हलकों में सवाल उठाए जाएँगे। इसलिये भारत के लिये चीन के साथ चल रही सैन्य तनातनी को ख़त्म करने की शर्त एक अच्छा बहाना साबित हो सकता है।
चीन द्वारा भारत के लद्दाख के सीमांत इलाक़ों में क़रीब दो सालों से सैन्य अतिक्रमण बनाए रखने पर सख़्त एतराज़ जताते हुए भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने वांग ई से साफ़ कह दिया कि जब तक चीनी सेनाएँ सीमांत इलाक़ों से पीछे नहीं चली जाएँगी भारत और चीन के बीच आला स्तर पर दौरों का सिलसिला बहाल कर आपसी राजनयिक रिश्ते सामान्य नहीं हो सकते।
भारत की इसी शर्त पर कोई अनुकूल जवाब नहीं देने पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने वांग ई के इस अनुरोध को ठुकरा दिया कि उन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाक़ात का वक़्त दिया जाए। वांग ई से साफ़ कह दिया गया कि प्रधानमंत्री मोदी काफ़ी व्यस्त हैं। वांग ई प्रधानमंत्री मोदी को ब्रिक्स शिखर बैठक में भाग लेने के लिये चीनी राष्ट्रपति का निमंत्रण देना चाहते थे।
भारत के इस रुख के साफ़ संकेत हैं कि इस साल पेइचिंग में चीन की मेजबानी में होने वाली ब्रिक्स शिखर बैठक में वह तब तक भाग लेने नहीं जाएंगे जब तक कि चीन भारत के सीमांत इलाक़ों से अपने सैनिक पीछे नहीं कर लेगा।
प्रधानमंत्री मोदी यदि चीन नहीं जाते हैं तो ब्रिक्स शिखर बैठक नहीं हो सकती। ऐसी स्थिति में ब्रिक्स के अस्तित्व पर सवाल उठाए जाएंगे।
जी-20 और ब्रिक्स की स्थापना क़रीब दो दशक पहले हुई थी। जी-20 विकसित और विकासशील देशों का एक अग्रणी संगठन है जिसमें आर्थिक और व्यापारिक व पर्यावरण मसलों पर सालाना शिखर बैठक के दौरान गहन चर्चा की जाती है। इसमें विश्व द्वारा सामना की जा रही आर्थिक चुनौतियों से साझा तौर पर विचार किया जाता है। आर्थिक मसलों के अलावा राजनीतिक मसलों जैसे ईरान के परमाणु कार्यक्रम और सीरिया जैसे मुद्दों पर भी विश्व के अग्रणी नेता चर्चा कर इनसे निबटने के उपायों पर भी विचारों का आदान प्रदान करते हैं। यह संगठन दुनिया के अग्रणी देशों- अमेरिका, चीन, रूस, भारत आदि देशों के नेताओं को एक मंच पर एक साथ मौजूद रहने का मौक़ा प्रदान करता है। इनके अलावा कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, ब्राज़ील, जापान, कोरिया, मैक्सिको, सऊदी अरब, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की, ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन इसके सदस्य देश हैं।
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दुनिया के इस अहम संगठन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को आमंत्रित किया जाता है तो अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय देशों के राष्ट्रप्रमुख इस शिखर बैठक में भाग नहीं लेंगे। इसका मतलब है कि जी-20 शिखर बैठक का आयोजन नहीं हो सकता। इससे जी-20 के बिखर जाने का सीधा ख़तरा दिखाई पड़ता है।
दूसरी ओर ब्रिक्स का गठन दुनिया के पांच अग्रणी विकासशील देशों को लेकर हुआ था तब यह कहा गया था कि ब्रिक्स विश्व पटल पर अमेरिका की दादागीरी को चुनौती देने की क्षमता रखता है। लेकिन ब्रिक्स से यदि भारत ने हाथ खींच लिये तो ब्रिक्स भी ढह जाएगा।
ब्रिक्स के ज़रिये अमेरिकी अगुवाई वाली कई आर्थिक संस्थाओं का एकाधिकार भी तोड़ने के सपने संजोये जाने लगे थे। ब्रिक्स ने ब्रिक्स डेवलपमेंट बैंक जैसी संस्थाएँ स्थापित कर इस दिशा में कई बड़े ठोस क़दम भी उठाए हैं। लेकिन ब्रिक्स के दो सदस्यों के बीच आपसी दुश्मनी के उग्र रूप धारण करने की वजह से ब्रिक्स की एकता टूटने के कगार पर दिखाई पड़ने लगी है।
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