इस वक़्त मोदी की अमेरिका यात्रा और उनके 'हाउडी मोदी' कार्यक्रम पर आलोचनात्मक टिप्पणी करना ख़तरे से ख़ाली नहीं है। चारों तरफ़ ख़ुशफ़हमी का माहौल खड़ा कर दिया गया है। लेकिन क्या सच में ऐसा है?
अगर बाबुल सुप्रियो ‘द टेलीग्राफ़’ पढ़ते तो संपादक को फ़ोन ही नहीं करते। ऐसी धारदार ख़बरें छापने वाला अख़बार अगर फ़ोन करने से डरने वाला होता तो बहुत पहले डर गया होता या फिर विज्ञापन छाप रहा होता।
दिसंबर, 2012 में हुए सनसनीखेज निर्भया कांड के बाद कठोर सज़ा के लिए कई निर्णय लिए गए थे। न तो त्वरित अदालतें गठित हुईं न महिला जजों को ऐसे केस सौंपे गए। निर्णय पर कितना हुआ पालन?
सऊदी अरब पर यमन के बाग़ियों ने जो हमला किया है, उससे सारी दुनिया में ख़तरे की घंटियाँ बजने लगी हैं क्योंकि दुनिया के देशों को सबसे ज़्यादा तेल देनेवाला देश यही है। लेकिन भारत क्यों तमाशबीन बना हुआ है?
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के तबादले और उच्चतम न्यायालय में उनकी पदोन्नति के लिये कॉलीजियम की कार्यशैली पर अब न्यायपालिका के अंदर से ही आवाज़ें उठने लगी हैं।
कुछ राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव से पहले आरएसएस और बीजेपी को अचानक दारा शिकोह की याद आई है। ‘काश दारा शिकोह सम्राट बनते’ का रोना क्यों रोया जा रहा है?
‘अगर मदरसे के युवा भी ग्रेजुएट होकर नौकरी के क़ाबिल हो जाएँ तो इसमें क्या ऐतराज़ है?’ यदि ऐतराज़ नहीं तो फिर अब तक इन मदरसों को मॉडर्नाइज क्यों नहीं होने दिया गया?
योगी आदित्यनाथ अगर यह फ़ैसला कर सकते हैं तो ऐसी कोई वजह नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी सांसदों और पूर्व सांसदों को मिलने वाले तमाम भत्तों में कटौती करने का निर्णय नहीं ले सकते।
आरएसएस और हिंदुत्ववादी भारत के मुसलमानों को औरंगज़ेब से प्रेरित क्यों मानते हैं और क्यों उन्हें गाहे-बगाहे औरंगज़ेब के भाई दारा शिकोह के रास्ते पर चलने की सलाह देते हैं?
संघ और बीजेपी के पास अपना कोई ऐसा नायक नहीं है, जिसकी उनके संगठन के बाहर कोई स्वीकार्यता हो। वे विवेकानंद जैसे संन्यासी को अपना बनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन विवेकानंद की विचारधारा तो संघ से अलग थी।