नब्बे साल का होना भी अब खबर नहीं क्योंकि आम तौर पर दीर्घायुता में वृद्धि हुई है, लेकिन किसी आलोचक का तकरीबन सत्तर साल तक रचनात्मक रूप से सक्रिय बने रहना ज़रूर खबर है।
ललित सहगल के नाटक ‘हत्या एक आकार की’ का 30 जनवरी को मंचन हुआ। उसी दिन ऐन शहीद दिवस को अलीगढ़ में कुछ हिन्दूसभाइयों ने गाँधी-हत्या को रिएनेक्ट किया। ऐसा क्यों?
स्त्री की शारीरिक ज़रूरतें और उस पर थोपे गई यौन शुचिता के पाखंड को अपने उपन्यास मित्रो मरजानी में कृष्णा सोबती ने बखूबी उभारा था। क्या कहना है मैत्रेयी पुष्पा का?
क़ैफी आज़मी के रोमांटिक गीतों ने धूम मचा दी और वे बॉलिवुड पर छा गए, पर मूल रूप से वे विद्रोह के कवि था। कम्युनििस्ट विचारधार पर चलने वाले क़ैफी ने कई विषयों पर कलम चलाई।