पूंजी बाज़ार ने शायद यह पहले ही मान लिया है कि सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी पहले से बहुत कम होगी। यह इससे समझा जा सकता है कि बंबई स्टॉक एक्सचेंज का संवेदनशील सूचकांक सेंसेक्स पहले ही 899.12 अंक गिरा।
जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद पर आम जनता ही नहीं, बैंक व वित्तीय संस्थाएं, उद्योग जगत, पूंजी बाज़ार, विदेश निवेशक, विदेशी क्रेडिट रेटिंग एजेन्सी सबकी नज़र रहती है। क्यों? आख़िर क्या होता है जीडीपी?
क्या भारतीय जनता पार्टी ने जानबूझ कर देश की आर्थिक स्थिति की ग़लत तसवीर पेश की? क्या उसने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पुराने आँकड़ों को मौजूदा आर्थिक स्थिति कह कर पेश किया है?
देश की जीडीपी में तेज़ गिरावट आई तो उसका आम इंसान की ज़िंदगी पर क्या फ़र्क पड़ेगा? भारत को फ़ाइव ट्रिलियन डॉलर यानी पाँच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के सपने का क्या होगा और इस हालत से उबरने का रास्ता क्या है?
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन ने कोरोना महामारी को ही ‘एक्ट ऑफ़ गॉड’ कहा है। ऐसा कहकर बीते छह सालों में लगातार गिरती अर्थव्यवस्था के वाजिब कारणों को पहचाने से भी बचने की कोशिश कर रही है केंद्र सरकार।
रिज़र्व बैंक के बाद अब दुनिया की मशहूर प्रबध सलाहकार कंपनी मैंकिजे ने कहा है कि चालू साल में भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में 3 प्रतिशत से 9 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है।
कोरोना महामारी को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन का असर यह हुआ कि अर्थव्यवस्था मई से जस की तस ठहरी हुई है। अर्थव्यवस्था की स्थिति बताने वाले 16 में से 14 इंडीकेटर दिखा रहे हैं कि हालत बदतर है।
रिज़र्व बैंक ने कहा है कि पिछले वित्त वर्ष के मुक़ाबले 2020 में बैंक धोखाधड़ी की रक़म दोगुनी हो गई है। इस वित्तीय वर्ष में 1.85 ट्रिलियन यानी क़रीब 18 खरब 50 अरब रुपये की धोखाधड़ी होने की रिपोर्ट सामने आई है।
कश्मीर रियाद के लिए बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है। वह इस पर एक सीमा से आगे नहीं जा सकता। पाकिस्तान और सऊदी अरब के हित अलग-अलग हैं और अब उनके रास्ते भी अलग हो रहे हैं।
लॉकडाउन की घोषणा या उससे पहले नौकरियों के बारे में जिस तरह की आशंकाएँ जताई जा रही थीं, ठीक वैसा ही असर हुआ है। लॉकडाउन के दौरान अप्रैल से जुलाई तक 1 करोड़ 89 लाख वेतन भोगी लोगों की नौकरियाँ चली गई हैं।