मोदी सरकार और बीजेपी ने बीते 20 दिनों में अपना पूरा जोर लगा लिया। शांतिपूर्ण ढंग से दिल्ली के रामलीला मैदान आ रहे किसान पंजाब से हरियाणा भी न पहुंच सकें, इसके लिए क्या जतन नहीं किए। सड़कें ख़ुदवा दीं, आंसू गैस के गोले छुड़वाए, पानी की बौछारें डलवाईं, रास्ते में बैरिकेड, पत्थर रखवाए, लेकिन किसान दिल्ली के बॉर्डर तक पहुंच गए और डेरा डाल दिया।
सरकार ने किसानों को बेवजह ही छेड़ा, वरना आज वे बॉर्डर्स पर नहीं दिल्ली के रामलीला मैदान में बैठे होते क्योंकि दिल्ली आने से 2 महीने पहले से उन्होंने रामलीला मैदान कूच करने की बात कही थी।
बढ़ता जाएगा किसान आंदोलन
अब किसान आ गए तो बीजेपी और मोदी सरकार की नींद उड़ी। मान-मनौव्वल का दौर शुरू हुआ और दो महीने से ज़्यादा वक़्त तक पंजाब में मालगाड़ी और यात्री रेल नहीं भेजने वाली मोदी सरकार किसानों से तुरंत बातचीत के लिए भी तैयार हो गई। कई दौर की बातचीत बेकार रही और इसी बीच किसानों ने भारत बंद भी बुला दिया। इसका ठीक-ठाक असर रहा और आगे की तैयारी रेलवे ट्रैकों पर कब्जा करने, अडानी-अंबानी के प्रोडक्ट्स का बहिष्कार करने की है।
इस बीच, बीजेपी के आला नेताओं और मोदी सरकार के मंत्रियों के बीच कई बैठकें हुईं। शाहीन बाग़ के आंदोलन में बैठे प्रदर्शनकारियों से बात तक नहीं करने वाली ये सरकार किसानों के आंदोलन के सामने घुटनों के बल आ गई है और पिछले 10 दिनों में कई बार बातचीत की टेबल पर आ चुकी है।
पिछले छह साल में कई राज्यों में और लगातार दो लोकसभा चुनाव जीत चुकी बीजेपी के बारे में कहा जा सकता है कि वह सत्ता के नशे में इस कदर चूर थी कि उसे इस बात का अंदाजा ही नहीं था कि देश में अभी भी ऐसे लोग सांस ले रहे हैं जो हुक़ूमतों के फ़ैसलों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर सकते हैं।
56 इंच का सीना
बीजेपी और मोदी सरकार जानते हैं कि किसान क़ानूनों को वापस लेने का मतलब है कि उनके समर्थकों सहित दुनिया भर में ये संदेश जाना कि नरेंद्र मोदी को पहली बार झुकना पड़ा। मोदी सरकार और बीजेपी संगठन को यह क़तई बर्दाश्त नहीं होगा क्योंकि पीएम मोदी की इमेज ऐसी बनाई गई है कि वह 56 इंच के सीने वाले हैं और देश के सबसे लोकप्रिय और करिश्माई नेता हैं।
अगर आज मोदी झुक जाते हैं तो कल कोई और इस तरह का जोर लगाकर उन्हें झुकाने की कोशिश करेगा। इसलिए, पार्टी ने झुकने के बजाए, कृषि क़ानूनों को वापस लेने के बजाए जनता की अदालत में जाने का फ़ैसला किया है।
आने वाले दिनों में बीजेपी 100 प्रेस कॉन्फ्रेन्स करेगी, देश के 700 जिलों में 700 किसान बैठकें करेगी। इन बैठकों और प्रेस कॉन्फ्रेन्सों में कैबिनेट मंत्री, आला नेता भाग लेंगे और कृषि क़ानूनों के बारे में लोगों को बताएंगे।
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बीजेपी और मोदी सरकार शायद अपना आख़िरी जोर लगा लेना चाहते हैं। वजह वही है कि मोदी को झुकने नहीं देना है। क्योंकि मोदी को झुकना पड़ा तो आने वाले कुछ महीनों में कई राज्यों में चुनाव हैं, वहां ग़लत मैसेज जाएगा। ग़लती से इन राज्यों में खासकर बंगाल में हार मिली तो फिर उससे आगे की राह और मुश्किल हो जाएगी।
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किसानों को बताया खालिस्तानी
किसान आंदोलन को ब्रांड मोदी के लिए ख़तरा देख बीजेपी के नेताओं और मंत्रियों ने शर्म-लाज को ताक़ पर रखते हुए अन्न उगाने वाले किसानों को खालिस्तानी बताया। उनके इस आंदोलन में चीन और पाकिस्तान का हाथ बताया। इससे किसानों का जोश और बढ़ा है और उन्होंने कहा कि किसान को बदनाम करने का जवाब वे ज़रूर देंगे।
बीजेपी-मोदी सरकार की यही चिंता है कि किसी भी तरह सारी ताक़त लगाकर ब्रांड मोदी को झुकने न दिया जाए। किसानों को खालिस्तानी बताने से जो नाराज़गी दुनिया भर में रह रहे पंजाबियों में है, उसका शायद सरकार और इसके अफ़सरों को अंदाजा नहीं है। देश में लोकतंत्र है और उसी से मिली ताक़त के आधार पर किसान अपनी आवाज़ उठा रहे हैं।
किसानों की बात समझे सरकार
किसानों की चिंताएं अपनी जगह जायज हैं क्योंकि बीते कुछ सालों में लाखों किसानों ने आत्महत्या की है। बड़े शहरों में किसानों की ज़मीन बिल्डरों ने, सरकारी योजनाओं के लिए ले ली गई है। सरकार किसान की इस बात को समझे कि वह अपनी ज़मीन के लिए जान भी दे देगा लेकिन उसमें किसी को पांव नहीं रखने देगा। किसान को डर है कि नए कृषि क़ानूनों से उसकी ज़मीन कॉरपोरेट्स के पास चली जाएगी। देखना होगा कि मोदी सरकार बनाम किसानों की इस एलानिया जंग में कौन फतेह हासिल करता है।
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