दिल्ली में तीनों नगर निगम एक होने जा रहे हैं। मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में इससे जुड़े प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। बीते काफी दिनों से इस बात की अटकलें लगाई जा रही थी कि दिल्ली में नगर निगमों का एकीकरण हो सकता है। साल 2012 से पहले दिल्ली में तीनों नगर निगम एक ही थे लेकिन 2012 में इन्हें तीन निगमों (उत्तरी, दक्षिणी और पूर्वी) में बांट दिया गया था।
केंद्र सरकार तीनों नगर निगमों को एक करने से जुड़ा विधेयक अगले हफ्ते संसद में ला सकती है।
साल 2017 के एमसीडी चुनाव में दिल्ली में उत्तरी, दक्षिणी और पूर्वी तीनों नगर निगमों में बीजेपी को जीत मिली थी जबकि आम आदमी पार्टी 2015 के विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत हासिल करने के बाद भी नगर निगमों में सत्ता हासिल नहीं कर पाई थी। 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में जीत के बाद से ही आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने नगर निगमों की सत्ता में भी आने का लक्ष्य बना लिया था।
चुनाव टालने का आरोप
पंजाब के विधानसभा चुनाव में मिली बड़ी जीत के बाद आम आदमी पार्टी जोर-शोर से इन चुनाव को लड़ना चाहती है। लेकिन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया सहित आम आदमी पार्टी के तमाम नेता मोदी सरकार और बीजेपी पर आरोप लगा रहे हैं कि वह जानबूझकर नगर निगम चुनाव में देरी कर रही है।
आम आदमी पार्टी लगातार आरोप लगाती रही है कि बीजेपी शासित इन नगर निगमों में जबरदस्त भ्रष्टाचार है और यह बेहद जर्जर हालात में हैं। नगर निगमों में दक्षिणी नगर निगम के पास आय के ठीक-ठाक साधन हैं जबकि पूर्वी और उत्तरी दिल्ली नगर निगम में आए दिन कर्मचारियों की हड़ताल होती रहती है।
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कमजोर होगी दिल्ली सरकार?
2012 से पहले दिल्ली नगर निगम की आर्थिक ज़रूरतें गृह मंत्रालय के मार्फत केंद्र सरकार पूरी करती थी। अब एक बार फिर नगर निगम को उससे भी मज़बूत स्थिति में लाने की तैयारी है। कहा जा रहा है कि एमसीडी के मेयर और पार्षदों को अधिक अधिकार मिलेंगे, दिल्ली में इलाक़ों का फिर से पुनर्सीमन होगा, रिजर्वेशन फिर से तय होगा, मेयर का कार्यकाल बढ़ाया जाएगा।
लेकिन क्या तब दिल्ली में दो समानान्तर सरकारें नहीं चलने लगेंगी। केंद्र सरकार में इन सवालों पर भी गहन विचार-विमर्श हो रहा है। इस तरह की ख़बरें तो छन-छनकर आ रही हैं कि अब मेयर का पद बहुत मज़बूत और अहम हो जाएगा।
अगर ऐसा होता है तो क्या दिल्ली सरकार की शक्तियां और कम हो जाएंगी?
अब अगर पुरानी स्थिति में जाने की तैयारी है तो फिर यह सवाल ज़रूर उठेगा कि क्या अब दिल्ली में नगर निगम को मज़बूत करके दिल्ली विधानसभा को पंगु बना दिया जाएगा या फिर उसका अस्तित्व ही ख़तरे में पड़ जाएगा? अगर ग़ौर किया जाए तो दिल्ली सरकार के पास आज भी यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी मर्जी से दिल्ली के लिए कोई क़ानून पास कर सके।
कहने को तो दिल्ली सरकार के पास ज़मीन, पुलिस और क़ानून-व्यवस्था नहीं है लेकिन असल में उसे किसी भी विभाग के बारे में कोई बिल लाने का भी अधिकार नहीं है।
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